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कब तक ईरान का साथ देगा चीन? मिडिल ईस्ट में ड्रैगन के फंसे 270 अरब डॉलर ने उड़ाई चिनफिंग की नींदHow long will China continue to support Iran? The $270 billion the 'Dragon' has tied up in the Middle East has cost Jinping his sleep

 

नई दिल्ली। भले ही चीन ईरान के सबसे बड़े कूटनीतिक सहयोगियों में से एक बना हुआ है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में फैले चीनी पूंजी के विशाल विस्तार के कारण राष्ट्रपति शी चिनफिंग का इस्लामिक गणराज्य के प्रति समर्थन सीमित हो रहा है।

महामारी के बाद से चीन ने मिडिल ईस्ट में अपना निवेश जमकर बढ़ाया। मंदी से प्रभावित कंपनियों ने इस मौका का फायदा उठाने की कोशिश की क्योंकि खाड़ी देश जीवाश्म ईंधन से हटकर ग्रीन टेक और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में विविधता लाने पर जोर दे रहे थे और इन क्षेत्रों में चीन की मजबूत पकड़ है। जाम्बिया और श्रीलंका जैसे विकासशील देशों के अपने कर्ज चुकाने में नाकाम रहने के बाद तेल भंडार से समृद्ध देश निवेश के लिए एक आकर्षक विकल्प नजर आए।


अमेरिका से आगे निकल रहा चीन

इस रणनीति की वजह से हाल के वर्षों में मिडिल-ईस्ट में चीनी निवेश और निर्माण कार्य दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ा है, जिससे यह क्षेत्र शी जिनपिंग की प्रमुख 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' का एक अहम लाभार्थी बन गया है। क्षेत्रीय फाइनेंसर के तौर पर चीन, अमेरिका से आगे निकल रहा है।

खतरे में चीन की स्थिरता

अब अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच के युद्ध ने वैश्विक बाजारों को हिलाकर रख दिया है और चीन की उस स्थिरता को खतरे में डाल दिया है, जिस पर वह अपने आर्थिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए निर्भर था। हालांकि ट्रंप ने ईरानी अधिकारियों को दो हफ्ते के युद्धविराम के लिए राजी करने का श्रेय चीनी अधिकारियों को दिया है, लेकिन उस क्षेत्र में स्थायी शांति को लेकर अभी भी बड़े सवाल बने हुए हैं।

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