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भारत-पाक वार्ताः तनाव के बीच कतर में हुई बैठक, ट्रैक-2 रणनीति ला रही है बड़े बदलावIndia-Pakistan Talks: Meeting Held in Qatar Amid Tensions; Track-2 Strategy Bringing Major Changes

 

भारत और पाकिस्तान के बीच आधिकारिक राजनयिक संबंधों में भले ही लंबे समय से बर्फ जमी हो, लेकिन पर्दे के पीछे ट्रैक-2 कूटनीति का चैनल पूरी तरह सक्रिय है। फरवरी 2026 में दोहा (कतर) में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच हुई गुप्त और अनौपचारिक बैठक ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब आधिकारिक संवाद के रास्ते बंद होते हैं, तो अनौपचारिक मंच ही उम्मीद की किरण बनते हैं। हाल ही में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों द्वारा पहलगाम में किए गए हमले के बाद उपजी भारी तल्खी के बावजूद, दोहा की यह बातचीत निरंतरता का संकेत है।


दरअसल, ट्रैक-2 कूटनीति वह माध्यम है जिसमें पूर्व अधिकारी, पत्रकार, बुद्धिजीवी और व्यापारिक नेता शामिल होते हैं। यह राजनीति और मीडिया की चकाचौंध से दूर एक ऐसा मंच है जहाँ बिना किसी आधिकारिक पुष्टि या प्रेस विज्ञप्ति के संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा की जाती है। भारत और पाकिस्तान के बीच यह सिलसिला दशकों पुराना है। अतीत में नीमराणा संवाद इसका प्रमुख उदाहरण रहा है। जब सरकारी स्तर पर यानी ट्रैक-1 वार्ताएं विफल हो जाती हैं, तो ये अनौपचारिक बैठकें भविष्य के समझौतों की जमीन तैयार करती हैं।

भारत की इस बैक-चैनल कूटनीति के परिणाम केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं हैं। चीन के साथ 2020 की गलवान झड़प के बाद जब संबंध पूरी तरह टूट चुके थे, तब ट्रैक-2 वार्ताओं ने ही संवाद की डोर थामे रखी। इसी का नतीजा था कि अक्टूबर 2025 में पांच साल बाद सीधी उड़ानें फिर से शुरू हुईं और सीमा पार व्यापार बहाल हुआ। अब 2026 में ब्रिक्स सम्मेलन के लिए चीनी राष्ट्रपति के भारत दौरे की संभावना भी इसी पर्दे के पीछे की मेहनत का फल मानी जा रही है। इतना ही नहीं, रूस-यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थता से लेकर कनाडा के साथ बिगड़े संबंधों को सुधारने तक में भारत ने ट्रैक-1.5 और ट्रैक-2 का बखूबी इस्तेमाल किया है। कनाडा के साथ हरदीप सिंह निज्जर मामले में पैदा हुए विवाद के बाद, जून 2025 की जी-7 बैठक और फिर 2026 की शुरुआत में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत यात्रा ने संबंधों को वापस पटरी पर ला दिया है। अब दोनों देश 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक ले जाने के लिए व्यापक आर्थिक समझौते पर चर्चा कर रहे हैं। स्पष्ट है कि वैश्विक कूटनीति के कठिन दौर में भारत की यह साईलेंट डिप्लोमेसी राष्ट्रीय हितों को साधने में एक अमोघ अस्त्र साबित हो रही है।

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