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1अप्रैल विशेष: जिंदगी की लेखा-जोखा में असली मुनाफा कहाँ हैApril 1st Special: Where Does the Real Profit Lie in the Ledger of Life??

 

अजय कुमार बियानी

पूरा साल हम और आप अंकों के जाल में उलझे रहे। बिक्री, वसूली, देनदार, लेनदार, कर और लाभ-हानि के हिसाब में दिन-रात खपते रहे। कागज़ों पर सब कुछ संतुलित दिखता रहा, पर भीतर का लेखा अक्सर उलझा ही रह गया। आज १ अप्रैल का दिन है—हास-परिहास का भी और आत्ममंथन का भी। “हिसाब-किताब में पक्के, पर जिंदगी में कच्चे”—यह कहावत जैसे हम सब पर कहीं न कहीं लागू होती है। इसलिए क्यों न आज थोड़ी देर के लिए दफ्तर की फाइलों से बाहर निकलकर, जीवन की अपनी बही-खाता पर भी नजर डाल ली जाए।

हमने वर्षों से सीखा है कि संपत्ति वह होती है जो हमें समृद्ध बनाए, और देनदारी वह जो हमें बोझिल करे। लेकिन जिंदगी की किताब में ये परिभाषाएँ थोड़ी अलग हैं। यहाँ सबसे बड़ी संपत्ति वह नहीं जो तिजोरी में बंद है, बल्कि वह है जो दिल में बसी है। परिवार, सच्चे मित्र और अच्छा स्वास्थ्य—ये वे स्थायी धरोहरें हैं जिन पर कभी क्षरण नहीं लगता। “सोना चांदी घटे-बढ़े, पर अपनापन सदा बढ़े”—यही जीवन का असली सिद्धांत है। इनकी कीमत समय के साथ घटती नहीं, बल्कि और अधिक मूल्यवान होती जाती है।

इसी तरह जीवन की चल संपत्तियाँ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। सुबह की कड़क चाय, सप्ताहांत की छोटी-सी छुट्टी, और बिना कारण मिल जाने वाली मुस्कान—ये छोटी-छोटी खुशियाँ ही जीवन की बड़ी पूंजी बनती हैं। “बूँद-बूँद से घड़ा भरता है”—यह कहावत यहाँ सटीक बैठती है। हर दिन की छोटी खुशी, जीवन के बड़े संतोष का आधार बनती है।

परंतु सबसे कीमती अमूर्त संपत्ति है मन की शांति। आज के समय में यह सबसे दुर्लभ हो गई है। भागदौड़ की इस दुनिया में हर कोई इसे पाने के लिए प्रयासरत है, पर बहुत कम लोग इसे संभाल पाते हैं। “मन चंगा तो कठौती में गंगा”—यदि मन शांत है, तो हर परिस्थिति सुखद प्रतीत होती है।

अब यदि देनदारियों की बात करें, तो जीवन में भी कुछ ऐसे बोझ हैं जिन्हें जितना जल्दी उतार दिया जाए, उतना ही बेहतर है। लंबे समय से मन में बैठा हुआ क्रोध, हर बात पर अधिक सोचने की आदत और अनावश्यक तनाव—ये ऐसी देनदारियाँ हैं जो धीरे-धीरे हमारी ऊर्जा को समाप्त कर देती हैं। “चिंता चिता समान”—यह केवल कहावत नहीं, बल्कि एक सच्चाई है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।

दैनिक जीवन की छोटी-छोटी देनदारियाँ भी कम हानिकारक नहीं होतीं। “लोग क्या कहेंगे” का भय, रिश्तेदारों के ताने और सप्ताह की शुरुआत का भारीपन—ये सब हमारे मनोबल को कम करते हैं। “निंदक नियरे राखिए”—कहा तो गया है, पर हर ताने को दिल पर लेना भी समझदारी नहीं। विवेक यही कहता है कि जो आवश्यक है, उसे ही महत्व दें।

और फिर कुछ ऐसी अनिश्चित देनदारियाँ भी हैं, जिनका कोई निश्चित समय नहीं होता। घर-परिवार में संबंधों की संवेदनशीलता, पति-पत्नी के बीच भावनाओं का उतार-चढ़ाव—ये जीवन का हिस्सा हैं। “जहाँ प्यार है, वहाँ तकरार भी है”—इस सच्चाई को स्वीकार करना ही संतुलन बनाए रखने का पहला कदम है।

यदि जीवन के लाभ-हानि खाते को देखें, तो आय और व्यय की परिभाषा भी बदल जाती है। यहाँ आय वह है जो हमें भीतर से समृद्ध करे—हमारी मुस्कान, हँसी-मजाक और अपनों के साथ बिताए गए अनमोल क्षण। वहीं व्यय वह है जो हमारी ऊर्जा को व्यर्थ करे—ईर्ष्या, अनावश्यक विवाद और नकारात्मक लोगों पर खर्च किया गया समय। “जैसा बोओगे, वैसा काटोगे”—यदि हम सकारात्मकता बोएंगे, तो परिणाम भी सुखद ही होगा।

अंततः, जीवन का वास्तविक लाभ वह है जो रात को बिस्तर पर जाते समय हमें सुकून की नींद के रूप में मिलता है। यदि दिन भर के बाद मन शांत है, तो समझिए कि आपने सही मायनों में लाभ कमाया है। “संतोषी सदा सुखी”—यह जीवन का अंतिम निष्कर्ष है।

इस पूरी लेखा-प्रणाली का सबसे बड़ा परीक्षक कोई मनुष्य नहीं, बल्कि वह अदृश्य शक्ति है जिसे हम ईश्वर कहते हैं। वही हमारे हर कर्म का मूल्यांकन करता है। इसलिए आवश्यक है कि हमारा खुशी का खाता हमेशा अधिशेष में रहे और पछतावे का खाता शून्य पर।

नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत में यही संकल्प लेना चाहिए कि हम केवल धन का नहीं, बल्कि जीवन का भी सही प्रबंधन करें। “समय रहते संभल जाए, वही सच्चा बुद्धिमान”—इस सीख को अपनाते हुए यदि हम आगे बढ़ें, तो निश्चित ही आने वाला वर्ष अधिक संतुलित और सुखद होगा।

मुस्कुराते रहिए, क्योंकि यही वह पूंजी है जो बांटने से बढ़ती है और जीवन को वास्तव में समृद्ध बनाती है।

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