सम्पादकीय
ईरान के खिलाफ बिना उकसावे वाले अवैध इजराइली-अमेरिकी युद्ध के शुरू होने के छह दिन बाद, समूचा पश्चिम एशिया अराजकता में डूब गया है। जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, अन्य नेताओं और कम से कम 160 स्कूली बच्चों को मार कर इस जंग का आगाज किया, तो उन्होंने ईरान के लोगों से इस्लामी गणराज्य को उखाड़ फेंकने और तमाम राजकीय संस्थानों पर कब्जा कर लेने का आह्वान किया। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजराइल के साथ-साथ फारस की खाड़ी इलाके में स्थित अमेरिकी ठिकानों, परिसंपत्तियों और दूतावासों को निशाना बनाया। उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों पर आधारित विश्लेषण से पता चलता है कि ईरान ने सात अमेरिकी सैन्य ठिकानों के संचार और रडार संरचनाओं पर हमला किया है। लेबनानी आतंकवादी समूह हिजबुल्लाह भी उत्तरी इजराइल पर रॉकेटों से हमले करके इस जंग में कूद गया। इराक में, ईरान समर्थक मिलिशिया ने इरबिल और अन्य इलाकों में अमेरिकी परिसंपत्तियों पर हमले किए हैं। पेंटागन के मुताबिक, अमेरिका ने इस बात की तस्दीक की है कि कुवैती “दोस्ताना गोलीबारी” में कम से कम छह सैन्यकर्मी मारे गए और तीन लड़ाकू विमान नष्ट हो गए। बीते 4 मार्च को, अमेरिका ने श्रीलंका के तट पर एक ईरानी युद्धपोत, आईआरआईएस देना को टॉरपीडो से निशाना बनाकर इस जंग को हिंद महासागर तक पसार दिया। इस हमले में कम से कम 83 कर्मी मारे गए। यह युद्धपोत पिछले हफ्ते विशाखापत्तनम के तट पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय बेड़ा समीक्षा (इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू) के वास्ते इस इलाके में मौजूद था। अगर ट्रम्प और उनके सहयोगी बेंजामिन नेतन्याहू ने यह सोचा था कि खामेनेई की हत्या से ईरान की सरकार का पतन हो जाएगा, तो इसके बजाय नतीजे में एक पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध छिड़ गया है।
दोनों में से किसी भी पक्ष ने पीछे हटने की इच्छा नहीं दिखाई है। अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ ने बुधवार को कहा कि यह संघर्ष आठ हफ्ते तक खिंच सकता है। ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी ने अमेरिका के साथ बातचीत से इनकार कर दिया है और अमेरिकी मीडिया ने बताया है कि वाशिंगटन ईरान के उत्तर-पश्चिम में नस्लीय कुर्द मिलिशिया को हथियार देने पर विचार कर रहा है ताकि आंतरिक अशांति को भड़काया जा सके। यह एक खतरनाक खेल है। ऐसा लगता है कि ट्रम्प ने बिना किसी निकास रणनीति के ही यह जंग छेड़ दिया है। चूंकि ईरानी राज्य और उसकी संस्थाओं के दरकने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं, लिहाजा अमेरिका ने बड़े पैमाने पर बमबारी और उस मुल्क में गृहयुद्ध को भड़काने की संभावनाओं का सहारा लिया है। अमेरिका ने चंद रोज पहले ईरान को धार्मिक शासन से “मुक्त” करने का वादा किया था। अगर यह जंग लंबी खिंचती है, तो ट्रम्प को घरेलू मोर्चे पर बढ़ते विरोध का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि उनके धुर दक्षिणपंथी समर्थकों का एक वर्ग पहले ही इसे “इजराइल की जंग” बता रहा है। जहां तक भारत का सवाल है, तेल और गैस की बढ़ती कीमतें उसकी अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ाएंगी, जबकि एक व्यापक जंग इस इलाके में रहने वाले लाखों भारतीयों की आर्थिक और शारीरिक सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है। नई दिल्ली, जिसने शुरू में एक मित्र देश के नेता खामेनेई की हत्या की निंदा नहीं की थी, को इस जंग के खिलाफ ज्यादा दृढ़ रुख अपनाना चाहिए और संघर्ष को खत्म करने के लिए अन्य शक्तियों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। भारत को इस जंग को अपने पड़ोस तक फैलाने की अमेरिकी कोशिशों का कड़ा विरोध करना चाहिए।

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