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कानून के दम पर हक की जीत, गलत बिलिंग और गलत ऑर्डर पर कंपनियों को देना पड़ा भारी हर्जानाVictory for Rights Through the Power of Law: Companies Forced to Pay Heavy Compensation for Erroneous Billing and Incorrect Orders.

 

उपभोक्ता जागरूक हों तो उनके अधिकार पर कोई डाका नहीं डाल सकता है। बंगाल के सिलीगुड़ी में गुरुंग बस्ती के रहने वाले अजय झा ने इसे साबित किया है। कई साल उन्होंने कानूनी लड़ाई लड़ी और कंपनी ने उनकी जितनी रकम डकार ली थी, उससे दो गुने से अधिक उन्होंने हासिल की।

दरअसल, अजय झा ने तीन मई 2016 को कैपिटल फाइनेंस कंपनी से कर्ज लेकर एलईडी टीवी खरीदी। कर्ज भरने को उसी साल जून से प्रति महीने 1606 रुपये की किस्त निर्धारित हुई। अजय झा के बैंक खाते से फाइनेंस कंपनी ने रकम काटनी शुरू कर दी।


उनसे चेक पर हस्ताक्षर करवा कर पहले से ही कंपनी प्रबंधन ने रख लिए थे। इएमआइ की एक चेक बाउंस हुई तो उन्होंने बैंक से जानकारी ली। तब उनको पता चला कि फाइनेंस कंपनी ने 400 रुपये गलत तरीके से उनके खाते से काटे हैं।

रुपये अतिरिक्त निकल जाने से जब दूसरा चेक जो लगाया गया तो वह बाउंस हो गया। इतना ही नहीं, छानबीन में पता चला कि जून से लेकर नवंबर तक कंपनी ने कभी 100 तो कभी 400, कुल 15 बार में 1983.30 रुपये उनके बैंक खाते से अतिरिक्त काट लिए। उन्होंने फाइनेंस कंपनी प्रबंधन से शिकायत की तो कोई सुनवाई नहीं हुई। तब उन्होंने कानून का सहारा लिया।जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने खारिज कर दिया मुकदमा

अजय ने बैंक प्रबंधन से बात कर पहले खाता फ्रीज कराया। फाइनेंस कंपनी को मेल कर समस्या समाधान की गुहार लगाई, लेकिन कंचनी प्रतिनिधि ने लोक अदालत में घसीटने की वसी दी। तब अजय ने 13 दिसंबर 2016 को दस्तावेज के साथ जिला उपभोक्तावाद नियोग में मुकदमें को आवेदन दिया। इसे आयोग ने खारिज कर दिया। निवारण के आयोग में अपील की। एसडी आदेश पर डीसीआरसी ने मुकदमा कर सुनवाई शुरू की। कहनेस कंपनी 1563 30 रुपये की।

कटौती को सुबूतों के आधार पर जाकर साबित नहीं कर सकी। 16 जनवरी 2005 को फाइनेंस कंपनी को छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ गलत तरीके से कटौती की गई राहत लौटाने का आदेश दिया गया। विवाद की वजह से उपभोक्ता के क्रेडिट स्कोर पर असर के वलते मानसिक और आर्थिक परेशानी जो हुई, उसके लिए पांच हजार रुपये और मुकदमा लड़ने में हुर खर्च के लिए पांच हजार रुपये भी देने का आदेश दिया गया। दो हजार रुपये आयोन के खाते में जया कराने का निर्देश भी दिया गया।

अन्याय का प्रतिकार जरूरी, अन्यथा ठगे जाते रहेंगे उपभोक्ता

अजय कहते है कि बात सिर्फ हजार रुपये की नई बल्कि अपने अधिकार की है। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की है। कर्ज के लिए फाइनेंस कंपनी ब्याज के साथ प्रति महीने निर्धारित तिथि पर ईमआई ले रही थी तो अतिरिक्त कटौती क्यों? (सिलीगुडी से मोहन झा)

बाजार के फैलते दायरे और सेवाओं की बढ़ती निर्भरता के बीच उपभोक्ता अक्सर ऐसी स्थितियों से गुजरता है, जहां गलती छोटी दिखाती है। पर उसका असर गहरा होता है। कभी बैंक खाते से बिना वजह रकम कट जाती है, कभी फाइनेंस कंपनी अतिरिक्त पैसे वसूल लेती है। तो कभी आनलाइन सेवा में साधारण दिखने वाली।

एक उपभोक्ता की आस्था और भरोसे को आहत कर देती है। अधिकतर लोग ऐसी परिस्थितियों में समझौता कर लेते हैं, लेकिन जब कोई नागरिक अपने अधिकारों की समझ के साथ कानून का रास्ता चुनता है तो वही छोटी शिकायत न्वाव की बड़ी मिसाल बन जाती है। ऐसे में बंगाल, पंजाब व उत्तर प्रदेश से सामने आई ऐसी घटनाएं बताती है कि उपभोक्ता अधिकार के कानून की किताबों तक सीमित नहीं हैं

धैर्य जाएगी साक्ष्य और कानूनी प्रक्रिया पर भरो रखा जाए तो साधारण उपभोक्ता भी बड़ी कंपनियों और संस्थाओं को जवाबदेह बना सकता है। यही जागरूकता आज उपभोक्ता अधिकारों की असली ताकत बनकर उभर रही है।

छोटी सी शिकायत पर आया बड़ा फैसला

ऑनलाइन सेवाओं के दौर में जागरूकता कितनी जरूरी है, लुधियाना की घटना इसका उदाहरण है। गलत भोजन डिलीवर होने की एक साधारण सी दिखने वाली शिकायत ने उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा की बड़ी मिसाल पेश की। उपभेक्ता फोरम ने मामले में फूड डिलीवरी प्लेटफार्म और रेस्तरां को संयुक्त रूप से 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया

मामला जनवरी 2022 का है। लुधियाना की वासु गुप्ता ने आनलाइन प्लेटफार्म स्विगी के माध्यम से बहराउज बिरयानी रेस्तरां से शाकाहारी बिरयानी एडवोकेट आर्डर की। डिलीवरी मिलने पर जब पैकेट खोला गया तो उसमें चिकन बिरयानी थी। वासु का कहना है कि वह 100 प्रतिशत शाकाहारी हैं और धार्मिक कारणों से मांसाहार नहीं खातीं। ऐसे में गलत भोजन पहुंचने से उन्हें न केवल असहज स्थिति का सामना करना पड़ा, बल्कि मानसिक परेशानी भी झेलनी पड़ी। इस घटना के बाद उन्होंने इसकी स्विगी व बहराउज दोनों से शिकायत की

शुरुआत में उनकी ओर से माफी मांगते हुए कूपन देने की पेशकश की गई और आर्डर की रकम भी वापस कर दी गई। हालांकि, उन्होंने इसे पर्याप्त समाधान नहीं माना और अपने पिता एडवोकेट रजनीश गुप्ता के माध्यम से उपभोक्ता आयोग में मामला दर्ज कराया। सुनवाई के दौरान आयोग ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता को वही वस्तु या सेवा उपलब्ध कराना सेवा प्रदाता की जिम्मेदारी है, जिसके लिए उसने भुगतान किया है।

आयोग ने कहा कि केवल पैसे वापस करना इस मामले में पर्याप्त नहीं है, क्योंकि गलत भोजन भेजे जाने से रजनीश गुप्ता शिकायतकर्ता की धार्मिक भावनाएं आहत हुई और उसे मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा। आयोग ने इसे सेवा में गंभीर कमी मानते हुए दोनों पर 50 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। साथ ही निर्देश दिया कि 30 दिनों में भुगतान न करने भी देना होगा। पर इस राशि पर आठ प्रतिशत वार्षिक ब्याज (लुधियाना से विनोद पुरोहित)

गलत इलाज पर मरीज ने डाक्टर को सिखाया सबक, दो लाख का जुर्माना

संगम नगरी के एक जागरूक उपभोक्ता ने इलाज में लापरवाही बरतने वाले एक नामचीन डाक्टर के खिलाफ न सिर्फ अपने अधिकार की लड़ाई लड़ी, बल्कि उसको यह सबक भी दिया कि एक उपभोक्ता की शिकायत पर टाल-मटोल करना कितना महंगा पड़ सकता है।

आमतौर पर रोग ठीक न होने पर मरीज चिकित्सक बदल देते हैं, लेकिन गोविंदपुर कालोनी निवासी हाई कोर्ट के अधिवक्ता रामप्रकाश राय ने इलाज की गड़बड़ी पर डा. विनय स्वरूप के खिलाफ लगभग 10 वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी। आखिरकार जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने डाक्टर को दो लाख रुपये हर्जाना भरने का आदेश दिया। साथ ही 10 हजार रुपये मुकदमा खर्च भी देने के निर्देश दिए।

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