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मध्यप्रदेश की आबकारी नीति में खेल—महंगे ठेकेदार ठगे, सस्तों को फायदा?
रिजर्व प्राइस पहले बढ़ाकर वसूली, फिर घटाकर ‘मनपसंद’ आवंटन?
नीति पर उठे सवाल—क्या सरकार खुद बना रही घाटे का जाल?
मध्यप्रदेश में शराब ठेका नीति एक बार फिर गंभीर विवादों में घिर गई है। आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर अब सिर्फ ठेकेदार ही नहीं, बल्कि बाजार विशेषज्ञ भी सवाल उठा रहे हैं। आरोप है कि सरकार की नीति राजस्व बढ़ाने के नाम पर असमानता और अव्यवस्था को बढ़ावा दे रही है।
नीति या ‘खेल’? समझिए पूरा मामला
हर साल आबकारी विभाग शराब दुकानों के समूहों के लिए एक रिजर्व प्राइस तय करता है। इस बार इसे करीब 20% तक बढ़ाकर लागू किया गया।
पहले चरण में
ठेकेदार ऊंची कीमत पर समूह उठाते हैं ,सरकार को तुरंत भारी राजस्व मिलता है लेकिन बाद में जो समूह नहीं बिकते, उनका रिजर्व प्राइस घटा दिया जाता है वही या आसपास के समूह सस्ते में आवंटित कर दिए जाते हैं ।
यहीं से शुरू होता है पूरा विवाद
“पहले लूटो… फिर बांटो” का आरोप
ठेकेदारों का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया
“पहले महंगे में बेचो, फिर सस्ते में बांटो”
जैसी बन गई है
जिसने पहले बोली लगाई
वह सालभर नुकसान झेलता है
और जो बाद में आता है
उसे सस्ता और फायदेमंद सौदा मिल जाता है
बाजार में असंतुलन—सरकार जिम्मेदार?
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस नीति के कारण:
निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा खत्म हो रही है
शुरुआती बोली लगाने का भरोसा टूट रहा है
बाहर के बड़े निवेशक मध्यप्रदेश से दूरी बना रहे हैं
भविष्य में सरकारी राजस्व पर भी असर तय है
नीति vs व्यवहार—डबल स्टैंडर्ड?
सबसे बड़ा सवाल यही है:
जब सरकार शराब की MSP/MIP से बाहर बिक्री पर सख्त है
तो ठेका प्रक्रिया में खुद कीमत क्यों गिरा रही है?
क्या नियम सिर्फ जनता के लिए हैं…
और ठेका प्रक्रिया में ‘लचीलापन’ सिर्फ सिस्टम के लिए?
ठेकेदारों का दर्द
एक ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा:
“जो जल्दी ठेका लेता है वही फंस जाता है…
बाद में वही दुकान आधे रेट में मिल जाती है।
यह नीति नहीं, सीधा नुकसान का सौदा है।”
अंदर की चर्चा—AC कमरों में बन रही नीति?
सूत्रों का दावा है कि
जमीनी हकीकत से दूर बैठकर फैसले लिए जा रहे हैं
बाजार की वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज किया जा रहा है
परिणाम नीति कागज पर सही, जमीन पर पूरी तरह फेल
क्या सरकार खुद असमानता को बढ़ावा दे रही है?
क्या यह ‘रेवेन्यू मैनेजमेंट’ है या ‘सिस्टम मैनेजमेंट’?
निष्कर्ष
मध्यप्रदेश की आबकारी नीति अब सिर्फ राजस्व का मुद्दा नहीं रह गई है— यह विश्वास, पारदर्शिता और निष्पक्षता की परीक्षा बन चुकी है।अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में
न ठेकेदार भरोसा करेंगे
न बाजार स्थिर रहेगा
और तब सच में कहना पड़ेगा
“यहां शराब नहीं… नीतियां नशे में हैं!”

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