सुप्रीम कोर्ट सोमवार को धार्मिक व्यक्तिगत कानून (Personal Law) में लैंगिक भेदभाव से जुड़ी एक बड़ी संवैधानिक चुनौती की जांच-पड़ताल करने के लिए सहमत हो गया, जिसमें यह सवाल उठाया गया है कि क्या एक पारसी महिला को दूसरे धर्म में शादी करने के बाद उसकी धार्मिक पहचान से वंचित किया जा सकता है.
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान की शुरुआती दलीलें सुनीं, जिनमें नागपुर पारसी पंचायत के संविधान के नियम 5(2) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है.
सुनवाई के दौरान, दीवान ने कहा कि यह मुद्दा समुदाय के लिए बार-बार होने वाली कानूनी लड़ाई है. वरिष्ठ वकील ने जोर देकर कहा कि मौजूदा याचिका खास तौर पर नागपुर अग्यारी (पारसी मंदिर) को चलाने वाले नियमों को चुनौती देती है. पीठ ने कहा, "हम नोटिस जारी कर रहे हैं. कानून के महत्वपूर्ण सवाल के साथ एक समान याचिका है."
दीना बुधराजा (Dina Budhraja) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, नागपुर पारसी पंचायत, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, महाराष्ट्र सरकार और चैरिटी कमिश्नर को नोटिस जारी किया.
याचिका में कहा गया कि यह नियम भेदभाव वाला है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और सम्मान का अधिकार), और अनुच्छेद 25 (धर्म की आजादी) का उल्लंघन करता है.
कथित तौर पर यह नियम गैर-पारसी से विवाह करने पर पारसी महिलाओं की धार्मिक पहचान और अग्यारी (अग्नि मंदिर) जैसे धार्मिक संस्थानों में प्रवेश को छीन लेता है. हालांकि, यह नियम उन पारसी पुरुषों पर समान प्रतिबंध लागू नहीं करता है जो समुदाय के बाहर विवाह करते हैं.

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