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चंदन, वंदन और जोरदार अभिनंदन Sandalwood, reverence, and a resounding welcome.

लोकतंत्र भी हिन्दी फिल्मों की तरह है। हिन्दी फिल्में सामान्यतः तीन घंटे की होती है और लोकतंत्र में भी जनप्रतिनिधियों की पांच साल तक फिल्म चलती है। फिल्मों में इंटरवल होता है उसी तरह लोकतंत्र में भी ढाई साल के बाद सामान्यतः इंटरवल होता है। लोकतंत्र में शुरू के भाग में जनप्रतिनिधि फिल्म का पूरा आनंद लेते हैं जैसे अमरीश पुरी, कादर खान, प्राण, जीवन आदि खलनायक आनंद लेते थे और बाद के भाग में जनता के लिए चंदन, वंदन व जोरदार अभिनंदन का फिल्मी शो धूमधाम से चलाया जाता है। “पहले भाग में जनप्रतिनिधि अपना खर्चा निकालते हैं, उसके लिए अपने क्षेत्र में सरकारी टेंडर निकाले जाते हैं बाकी सारा कार्य ठेकेदार कर देते हैं। गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगती हैं।”


सामान्यतः जनता इन सब बातों को लोकतांत्रिक पर्व चुनाव के समय नहीं समझ पाती हैं। वह उस समय भावुकता की शिकार रहती है। वादों व नगद के मोहपाश में मगन हो जाती है। इधर लोकतांत्रिक फिल्म की कहानियां लिखने वाले यह सब अच्छे से जानते हैं। वे गोपनीय रूप से निर्देशक की भी भूमिका में रहते हैं। जनता उन्हें नेता व जनप्रतिनिधि समझती हैं लेकिन वे पांच वर्षों के लिए एक ब्लॉकबस्टर(सुपरहिट) फिल्म पर कार्य कर रहे होते हैं। बाद में जिसकी कमाई के अपने कीर्तिमान बनते हैं। बड़ी बड़ी जाँच एजेंसियां इस फिल्मी पठकथा को नहीं समझ पाती है। न्यायालय पहले से ही न्याय की मूर्ति बनकर सबकुछ मौन होकर देखता रहता है।

दूसरे भाग में जनता को चुनाव आने तक चंदन तिलक लगाया जाता है। मुफ्त का चंदन भी समय समय पर सप्रेम भेंट किया जाता है। बड़े बड़े तुलसी घाट बनाकर, वहां पर जनता के साथ बैठकर जनप्रतिनिधि चंदन घिसते हैं। लोकतंत्र में सबका भला हो - जैसे लोकगीत चंदन लेप के साथ सामूहिक रूप से गाए जाते हैं। “इस भाग में चंदन वृक्ष से लिपटे सांपों व नागों को अपने अपने बिलों में रहने का सरकारी निवेदन किया जाता है। जिससे कुछ समय के लिए चंदन का उपयोग जनता को तिलक लगाने के लिए किया जा सके। यह तिलक लगाना कम, टोपी पहनना जैसा ज्यादा रहता है।” 

इसी भाग में जनता का वंदन भी जोरों शोरो से किया जाता है। उसे भगवान तक बना दिया जाता है। जनता स्वर्ग में होने का विश्वास पाल लेती है। उसे भविष्यपुराण का पाठ पढ़ाया जाता है। इस लोकतांत्रिक वंदना में जनता जनार्दन की चरण वंदना से लेकर उसके मस्तक की वंदना तक होती है। इस वंदना में बधाईयों व शुभकामनाओं का बड़ा सा संदेश रहता है। प्रतिदिन वाट्सएप पर ऐसे संदेश दनदनाते रहते हैं। जनता स्वयं को अभिभूत मानती है। भूमि पूजन, शिलान्यास व फीता काटने की होड़ गति पकड़ने लगती है। चौराहों पर चहरों व चाकरी के बड़े बड़े कटआउट लगने लगते हैं।

फिल्म के दूसरे भाग का नशा जनता पर ऐसे चढ़ता है कि वह लोकतंत्र की महाआरती आते-आते तक सबकुछ भूल बैठती हैं। उसे सिर्फ सुनहरा भविष्य ही नजर आता है। बड़े बड़े चहरे व वादे चौराहों पर खड़े हो जाते हैं। उसे चहुंओर एक्सप्रेस भविष्य दिखता है। वह अपने भूतकाल को भूल जाती हैं। लोकतांत्रिक सिपाही उसे उसके भूतकाल से बहुत दूर भगा ले जाते हैं। यह फिल्मी पठकथा अपने उद्देश्य में धीरे धीरे सफल होने लगती है। यहां जनता व लोकतंत्र का जोरदार अभिनंदन किया जाता है। मंचों से जोरदार अभिनंदन करने का आह्वान किया जाता है। फूल मालाएं कम पड़ने लगती है। जनता के घरों की चौखट पर हर छोटी छोटी बात पर वंदना की जाती है। फिर भी जनता के जोरदार अभिनंदन समारोह में कमी पड़ती है तो उसके बैंक खातों में सीधे चंदन का वंदन भेजा जाता है। मोबाइल पर चंदन का वंदन संदेश सुनकर एक बार फिर जनता लोकतंत्र व उसके सिपाहियों के प्रति अभिभूत हो जाती हैं! जोरदार अभिनंदन की महिमा में लोकतंत्र की भव्य झांकीयां अपनी अपनी प्रस्तुतियों से जनता का दिल जीतने में सफल होने लगती हैं। चंदन, वंदन व जोरदार अभिनंदन के भव्य फिल्मी शो पर फिर अगले पांच वर्षों के लिए तन, मन व धन से माननीय लग जाते हैं और जनता इस फिल्मी कथा को देखने के बाद एक नई आशा के साथ अपनी-अपनी दाल-रोटी में लग जाती हैं। लोकतंत्र नेपथ्य के पीछे से मंद-मंद मुस्कुराता है..!!

भूपेन्द्र भारतीय

205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,

जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)

मोब. 9926476410

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