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मोहन सरकार की शिक्षा नीति से सैकड़ों बच्चों का भविष्य अंधकार में..The future of hundreds of children hangs in the balance due to the Mohan government's education policy.

 

मध्यप्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने और गरीब व मध्यम वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू किए गए सांदीपनि विद्यालय आज खुद सवालों के घेरे में हैं। जिस योजना को बच्चों के उज्जवल भविष्य की नींव माना गया था, वही अब कई बच्चों के सपनों पर ताला लगाती नजर आ रही है।


ताजा मामला डीपीआई (लोक शिक्षण संचालनालय) के एक ऐसे आदेश से जुड़ा है, जिसने शिक्षा के अधिकार और समान अवसर की अवधारणा पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इस आदेश के अनुसार, निजी (प्राइवेट) स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को सांदीपनि विद्यालयों में प्रवेश नहीं दिया जाएगा। सवाल यह है कि क्या यह निर्णय वास्तव में शिक्षा सुधार की दिशा में उठाया गया कदम है या फिर यह एक नई असमानता को जन्म दे रहा है?

सरकार का उद्देश्य था कि आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम वर्ग के बच्चों को भी उच्च स्तर की शिक्षा मिले, लेकिन जब किसी बच्चे को केवल इस आधार पर बाहर कर दिया जाए कि वह पहले किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ चुका है, तो यह नीति अपने मूल उद्देश्य से भटकती हुई नजर आती है। कई ऐसे परिवार हैं जो किसी कारणवश निजी स्कूलों की फीस नहीं चुका पा रहे हैं और अब वे अपने बच्चों को बेहतर विकल्प के रूप में सांदीपनि विद्यालय में दाखिला दिलाना चाहते हैं, लेकिन डीपीआई का यह आदेश उनके रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन गया है।

यहां एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि क्या शिक्षा को वर्गों में बांटना उचित है? क्या एक बच्चे की योग्यता और उसका भविष्य इस बात से तय होना चाहिए कि उसने पहले किस प्रकार के स्कूल में पढ़ाई की? यदि कोई बच्चा पढ़ाई में अच्छा है और वह बेहतर संसाधनों का लाभ लेना चाहता है, तो उसे अवसर क्यों नहीं दिया जा रहा?

विशेषज्ञों की मानें तो इस तरह के आदेश न केवल बच्चों के अधिकारों का हनन करते हैं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव को भी बढ़ावा देते हैं। शिक्षा का अधिकार हर बच्चे का मौलिक अधिकार है, और इस तरह के प्रतिबंध उस अधिकार की भावना के विपरीत हैं।

ग्रामीण और छोटे शहरों में रहने वाले कई अभिभावक इस फैसले से खासे नाराज हैं। उनका कहना है कि जब सरकार खुद बेहतर शिक्षा का वादा करती है, तो फिर ऐसे नियम बनाकर बच्चों के रास्ते क्यों बंद किए जा रहे हैं। यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या इस आदेश को लागू करने से पहले जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश की गई थी या नहीं।

यदि सरकार वास्तव में शिक्षा के स्तर को सुधारना चाहती है, तो उसे ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो समावेशी (inclusive) हों, न कि भेदभावपूर्ण। जरूरत इस बात की है कि हर बच्चे को उसकी योग्यता और आवश्यकता के आधार पर अवसर दिया जाए, न कि उसके पिछले स्कूल के आधार पर उसे रोका जाए।

अब देखना यह होगा कि मोहन सरकार इस बढ़ते विवाद पर क्या रुख अपनाती है। क्या यह आदेश वापस लिया जाएगा या फिर सैकड़ों बच्चों का भविष्य यूं ही अनिश्चितता के अंधेरे में छोड़ दिया जाएगा?

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