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सांच कहने का सऊर ......The courage to tell the truth

 

       • रवि उपाध्याय यूवीवी वो जेपीहज

हमारी संस्कृ एक इन वेटिंग एक बीसीएमति मेंमेंसी हमको सर्वोच्च स्थान दिया गया है। सत्यवादी हरिश्चन्द्र हमारी संस्कृति के ऐसे ही ऐतिहासिक व्यक्तित्व की कथा है।सत्यमेव जयते हमारे देश का आदर्श वाक्य है। यह वाक्य हमारे राष्ट्रीय चिन्ह शेरों के नीचे भी उत्कीर्ण है। इसी तरह हमारे वेद और उपनिषदों से लिया गया सूक्ति वाक्य है सत्यं शिवं सुंदरम। जिसके अनुसार सत्य को ही शिव और सुंदर बताया गया है। इसका आशय यह है कि सत्य शायद उतना ही प्राचीन है जितनी प्राचीन प्रकृति है। सूरज, चांद और सितारे हैं। वर्तमान संदर्भों में बात की जाए तो सत्य उतना ही प्राचीन है जितना प्राचीन असत्य है। असत्य है जहां सत्य है वहां। असत्य पर सत्य की जीत ही तो सत्य है। पुराणों में वर्णित भगवान सत्यनारायण की कथा मात्र लीलावती और कलावती की कथा नहीं है। वास्तव में यह सत्य प्रतिस्थापन की ही कथा है।


पांच सदी पहले एक संत कबीरदास जी हुए हैं। उन्होंने सत्य की विडंबनाओं का उल्लेख अपने इस पद में करते हुए लिखा है। संत देख जग बौराना, साँच कहौं तो मारन धावे, झूठे जग पतियाना। बताया जाता है कि कबीर साहब का जन्म सन् 1398 में बनारस में हुआ और निधन सन् 1518 में हुआ। कबीरदास जी ने इस पद में उस समय की स्थितियों का बखान करते हुए लिखा है कि देखो दुनिया कैसी बौरा गई है यानि की पागल हो गई है कि वो सत्य कहने पर तो मारने को दौड़ती है और झूठ बात पर भरोसा कर लेती है। कबीर दास जी के निधन हुए पांच सदियां गुजर चुकीं हैं, लेकिन हालात आज भी जस के तस बने हुए हैं। उस जमाने में भी लोग सच बोलने पर मारने को दौड़ते थे,(या प्रताड़ित करते थे ) झूठ पर सहज ही विश्वास कर लेते थे। आज भी हालात यही है।


हर बात कहने का एक सलीका होता है। एक सऊर होता है।उसी तरह सत्य कहने का भी एक तरीका है। एक ढंग होता है। यह देखा जाना चाहिए कि सत्य हम कब और किस के सामने कह रहे हैं। उस समय के हालात और परिस्थितियां क्या हैं। आजकल हम टीवी की बहस में हम अक्सर नेता और प्रवक्ताओं को यह कहते हुए सुनते हैं कि टाइमिंग ठीक नहीं है। टाइमिंग पर सवाल उठते हैं। हर बात मौका देख कर ही करनी चाहिए। मौके का लाभ उठाने वाला ही सफल आदमी होता है। मौका देख कर ही चौका मारा जाता है। हम सब जानते हैं कि बिन मौका चौका मारने पर आदमी कैच आउट हो जाता है। 

पिछले दिनों एक खबर सामने आई कि नेशनल बुक ट्रस्ट ने आठवीं कक्षा की पुस्तक में "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार " शीर्षक से एक पाठ शामिल किया है। किसी सत्यवादी ने इसकी चुगली कर दी, हुजूर - यह ज्यूडिशरी पर हमला है। यह नेशनल ट्रस्ट का यह मिस ट्रस्ट है। बस फिर क्या था। योर ऑनर ने एनबीटी को बिना सुने वो लताड़ा, वो लताड़ा कि क्या कहने। सब और न्याय और भ्रष्टाचार धरा का धरा रह गया। अब जिसने यह गलती करी उनकी सात पीढ़ी भी सच और भ्रष्टाचार नामक शब्द भी कभी जुबां पर लाने की जुर्रत नहीं करेंगी। वहां के बारे में सच लिखने की हिमाकत भला कोई कैसे कर सकता है। जहां सत्य का कोई काम न हो।

संविधान लागू होने के बाद देश भर में राष्ट्रपिता बापू को सत्य का प्रतीक मान कर उनकी फोटो को सरकारी दीवार पर ठोक दीं गईं। पर यह बताईए आप और हमने कभी किसी अदालत के कक्ष में राष्ट्रपिता बापू का फोटो टंगे देखा है क्या ? नहीं देखा है न । कभी सोचा है ऐसा क्यों ? शायद यह निर्णय यह सोच कर लिया गया होगा कि श्याम रंग पहनने वाले विद्वानों द्वारा बोले जाने वाले भारी भारी सत्य को गांधी जी सहन नहीं कर सकेंगे। जिस भी व्यक्ति को यह सुमति प्राप्त हुई वो साधुवाद के हकदार है। वैसे भी हम सब में इतना सलीका तो होना ही चाहिए कि अंधे को अंधा नहीं, सूरदास कहा जाता है। एक चक्षु को नयन सुख और अपंग को विकलांग कहा जाता है। काले रंग को श्याम रंग कहा जाता है। मौज मस्ती करने वाले को रंगीन मिज़ाज हरफन मौला कहा जाता है।

गांधी जी ने भी डंके की चोट पर सत्य बोला पर बड़े सलीके के साथ। उन्होंने 

अफ्रीका से भारत लौटने के बाद यह तब किया जब भारत में जनता ने उन्हें अपना महात्मा मान लिया। इसी के बाद उन्होंने अपने बचपन से लेकर 1921तक की जीवन यात्रा पर एक आत्मकथा लिखी। उस पुस्तक का शीर्षक था "सत्य के साथ मेरे प्रयोग"। उन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा " मो सम कौन कुटिल खल कामी, जिन तनु दियो ताहि बिसरायो, एसो नमक हरामी । ऐसा लिखने की हिम्मत वही कर सकता है जो सत्य का अनुगामी हो। बापू जीवन भर सत्य के साथ रहे। इसमें कोई संशय नहीं है।

सिनेमा में प्रदर्शित की जाने वाली अदालतों में हमने न्याय की देवी की वह मूर्ति देखीं हैं जिनकी आंखों पर पट्टी चढ़ी रहती हैं। लेकिन सच्ची मुच्ची की अदालतों में इस तरह की मूर्ति नहीं होती हैं। हो सकता है इनको यह मान कर हटा दिया गया हो कि भले ही ये मूर्ति पट्टी बंधे होने के कारण देख नहीं पातीं हों पर कान का क्या, वो सुन तो सकतीं ही हैं ना। कहीं किसी से कह दिया तो फिर ? वैसे भी कहा जाता है कि औरतों के पेट में बात नहीं पचती है। 

यह देखा गया है कि आपातकाल के बाद से सरकारी दफ्तरों की दीवारों से बापू की फोटो या तो हटा दी गई हैं या हो सकता है कि वे तस्वीरें खुद ही खुद शर्मसार हो गायब हो गईं हों। क्योंकि उन बूढ़े हाड़ों और आंखों में सियासत में हो रहे पतन को देखने की हिम्मत नहीं बची हो। यह भी हो सकता है कि यह काम ऑफिस के ही उन कर्मचारियों ने किया हो जिनकी बापू में प्रबल आस्था रही हो। उन्होंने ही यह तस्वीरें शायद इसलिए हटा दीं गईं हों, कि बापू की तस्वीर के सामने नागरिकों से चाय-पान की डिमांड करना उन्हें नागवार लगता हो। बापू के प्रति उनके इस सम्मान पर मेरा मन उनके लिए श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है। आखिर आंखों की शर्म तो इन लोगों में बाकी तो है। अब बापू की तस्वीरें अब ऑफिस के स्टोर रूम में दीवार से टिकी हुई हैं।

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