अजय कुमार बियानी
दुनिया इन दिनों अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, वैश्विक शक्तियों की खींचतान और ऊर्जा संसाधनों पर बढ़ती निर्भरता ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक जटिल मोड़ पर ला खड़ा किया है। इसी पृष्ठभूमि में एक ऐसी घटना सामने आई जिसने यह संकेत दिया कि विश्व की उथल‑पुथल के बीच भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन को लेकर अत्यंत सजग दिखाई दे रहा है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच यह समाचार सामने आया कि भारत और ईरान के बीच संवाद के बाद हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले भारतीय ध्वज वाले तेल वाहक जहाजों को सुरक्षित मार्ग देने की अनुमति दी गई है। यह वही समुद्री मार्ग है जहाँ से विश्व के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। युद्ध की आशंका के बीच जब कई देशों के जहाज इस मार्ग को लेकर आशंकित दिखाई देते हैं, तब भारतीय जहाजों के लिए सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था केवल एक सामान्य कूटनीतिक उपलब्धि नहीं मानी जा सकती।
ऊर्जा आज की वैश्विक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। तेल और गैस केवल आर्थिक संसाधन नहीं रहे, बल्कि वे देशों की रणनीतिक शक्ति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भी प्रभावित करते हैं। ऐसे समय में भारत की नीति लंबे समय से स्पष्ट रही है कि ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसी कारण भारत ने वैश्विक दबावों के बावजूद अपने ऊर्जा स्रोतों को विविध बनाए रखने का प्रयास किया है।
बीते कुछ समय से वैश्विक स्तर पर यह चर्चा होती रही कि भारत को रूस से तेल आयात कम करना चाहिए। परंतु भारत ने अपनी नीति में स्पष्ट किया कि देशहित और ऊर्जा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिए जाएंगे। यही वह बिंदु है जहाँ से ऊर्जा राजनीति का व्यापक परिदृश्य समझ में आता है।
विश्व में कुछ प्रकार का कच्चा तेल ऐसा होता है जिसे परिष्कृत करना तकनीकी दृष्टि से कठिन माना जाता है। लैटिन अमेरिका का वेनेजुएला इसी प्रकार के भारी कच्चे तेल के लिए जाना जाता है। इस तेल को परिष्कृत करने की क्षमता दुनिया की सीमित कंपनियों के पास है और भारत की परिष्करण क्षमता इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यदि भविष्य में ऐसे स्रोतों से तेल की उपलब्धता बढ़ती है और उसका परिष्करण भारत में होता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में नए समीकरण उभर सकते हैं।
उधर पश्चिम एशिया में अचानक बढ़े तनाव ने विश्व को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है। इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया। जब संघर्ष की आशंका बढ़ती है तो सबसे पहले ऊर्जा आपूर्ति के मार्ग प्रभावित होते हैं। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य इसी कारण से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि यहाँ से गुजरने वाला तेल विश्व अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ऐसे संकटपूर्ण समय में भारत की नीति संतुलित और संयमित दिखाई देती है। भारत ने न तो युद्धोन्मुखी बयानबाजी की और न ही किसी पक्ष के साथ अतिरेकी रुख अपनाया। इसके बजाय उसने संवाद और संतुलित कूटनीति के माध्यम से अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप भारतीय जहाजों के लिए सुरक्षित मार्ग की व्यवस्था संभव हो सकी।
यदि इस पूरे घटनाक्रम को व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति कई बार शतरंज की तरह चलती है। एक ओर वैश्विक शक्तियाँ अपने हितों के लिए प्रतिस्पर्धा करती हैं, वहीं उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अपनी रणनीति के माध्यम से अवसर तलाशती हैं। भारत भी इसी प्रक्रिया में अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के प्रयास करता दिखाई देता है।
भविष्य में यदि भारत को विविध स्रोतों से स्थायी और अपेक्षाकृत सस्ता तेल प्राप्त होता है, तो इसका प्रभाव केवल ईंधन मूल्यों तक सीमित नहीं रहेगा। यह देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगा, आर्थिक स्थिरता को बढ़ाएगा और वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की भूमिका को अधिक प्रभावशाली बना सकता है।
संभव है कि आज की घटनाएँ केवल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम हों। परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि जो देश दूरदर्शिता के साथ रणनीति बनाते हैं, वे वैश्विक परिवर्तनों के बीच अपने लिए नई संभावनाएँ भी तैयार कर लेते हैं।
दुनिया भले ही युद्ध और तनाव की खबरों में उलझी दिखाई दे, परंतु भारत का प्रयास यही है कि वह शांति, संतुलन और दूरदर्शिता के साथ अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करता रहे। यही नीति आने वाले समय में भारत की वास्तविक शक्ति बन सकती है
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