जांच सही दिशा में या गलत? फैसला आने तक जिंदा रहेगा सवाल
मध्यप्रदेश के आबकारी विभाग के अपर आबकारी आयुक्त राजेश हेनरी इन दिनों एक गंभीर आरोप के कारण चर्चा में हैं। उन पर आपराधिक षड्यंत्र के तहत कथित रूप से फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनवाकर नौकरी हासिल करने का आरोप लगाया गया है। आरोप यह भी है कि इसी प्रमाणपत्र के आधार पर वे पिछले लगभग 35 वर्षों से आबकारी विभाग में सेवा कर रहे हैं।
मामला तब और गंभीर हो गया जब छत्तीसगढ़ की उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति ने उनके अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाणपत्र की जांच के लिए इसे जिला स्तरीय समिति के पास भेजा। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि करीब दो वर्षों तक यह जांच लंबित ही पड़ी रही।
अब इस पूरे मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग ने हस्तक्षेप करते हुए बिलासपुर कलेक्टर और मध्यप्रदेश शासन के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर 15 दिन के भीतर जवाब मांगा है। आयोग की इस कार्रवाई के बाद यह मामला फिर चर्चा में आ गया है।
जांच सही या गलत — यह अभी तय नहीं
किसी भी प्रकरण में यह कहना जल्दबाजी होगी कि जांच सही दिशा में चल रही है या गलत। इसका अंतिम निर्णय तो तभी संभव है जब पूरी जांच प्रक्रिया पूरी हो और संबंधित प्राधिकरण अपना स्पष्ट निर्णय दे।
हालांकि इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रश्न अब यह बन गया है कि निर्णय आखिर कब आएगा?
जांच की दिशा पर बहस हो सकती है, तथ्यों को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन यदि कोई जांच अनिश्चित काल तक लंबित रहती है, तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
न्याय का मूल सिद्धांत भी यही कहता है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि समय पर होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। यदि निर्णय में अत्यधिक देरी होती है, तो कई बार यह देरी ही नए सवालों को जन्म देने लगती है।
अफसर का पक्ष – जांच गलत दिशा में
सूत्रों के अनुसार संबंधित अधिकारी का मानना है कि जांच ही गलत दिशा में चल रही है और वास्तविक तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। यही कारण है कि मामले में लगातार बहस और विवाद की स्थिति बनी हुई है।
पुराना उदाहरण भी देता है संकेत
आबकारी विभाग में ऐसा विवाद पहली बार सामने नहीं आया है। इससे पहले पूर्व आबकारी अधिकारी नागेश्वर सोनकेशरी का मामला भी काफी चर्चित रहा था।
बताया जाता है कि सोनकेशरी 1998 में सेवा में आए, लेकिन फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आरोप में 2010 में सेवा से बाहर किए गए। इसके बाद उन्होंने न्यायालय से स्टे आदेश प्राप्त कर लिया और लगभग दो दशकों तक नौकरी करते रहे। अंततः 2021 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
लेकिन उस पूरे प्रकरण में भी यह सवाल उठे थे कि लंबे समय तक सेवा लेने के बाद शासन ने न तो कोई जवाबदेही तय की और न ही किसी प्रकार की रिकवरी की।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
यही वजह है कि अब राजेश हेनरी के मामले में भी एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है —
यदि जांच और निर्णय में अत्यधिक देरी होती है, तो क्या यह सरकारी राजस्व और प्रशासनिक जवाबदेही के लिए नुकसानदायक साबित नहीं होगा?
क्योंकि यदि किसी अधिकारी की नियुक्ति या सेवा कथित रूप से गलत आधार पर हुई हो, तो उससे जुड़े वेतन, पदोन्नति और सेवा लाभ भी स्वाभाविक रूप से जांच के दायरे में आते हैं।
सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी
इस पूरे प्रकरण में फिलहाल बहस इस बात पर नहीं है कि जांच किस दिशा में चल रही है। असली सवाल यह है कि जांच का अंतिम परिणाम कब सामने आएगा।
जब तक स्पष्ट निर्णय नहीं आता, तब तक यह मामला केवल आरोप-प्रत्यारोप और संशय के बीच ही घूमता रहेगा।
और शायद यही कारण है कि फिलहाल इस पूरे प्रकरण पर एक ही पंक्ति सबसे सटीक बैठती है—
“जांच सही दिशा में है या गलत, यह तो फैसला बताएगा… लेकिन फैसला आने तक सवाल जिंदा रहेंगे।”

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