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हाईकोर्ट का सख्त संदेश: आदेश की अवहेलना पर स्वास्थ्य विभाग के बड़े अधिकारियों को 2 महीने की जेलHigh Court's Stern Message: 2 Months' Imprisonment for Senior Health Department Officials for Disobeying Orders

 

प्रमुख सचिव से लेकर जिला चिकित्सालय अधिकारी तक दोषी करार, 22 सुनवाई के बाद भी पालन नहीं

इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने अदालत के आदेशों की अवहेलना करने वाले सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति प्रणय वर्मा की एकलपीठ ने स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुए दो महीने की साधारण कारावास की सजा सुनाई है। हालांकि न्यायालय ने इस सजा को तीन सप्ताह के लिए स्थगित रखते हुए अंतिम अवसर दिया है कि अधिकारी अदालत के आदेश का पूर्ण पालन कर दें।  


इस मामले में प्रमुख सचिव, स्वास्थ्य विभाग; आयुक्त स्वास्थ्य विभाग; संयुक्त आयुक्त स्वास्थ्य विभाग तथा जिला चिकित्सालय अधिकारी, मंदसौर को अदालत के आदेश का पालन न करने का दोषी पाया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी पद पर बैठे अधिकारियों को न्यायालय के आदेशों का पालन करना अनिवार्य है और उसकी अनदेखी किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकती।

मामला वर्ष 2022 में दायर एक रिट याचिका से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ता को वर्ष 2004 से 7 अप्रैल 2016 तक नियमितीकरण का लाभ तथा उससे जुड़े सभी परिणामी लाभ प्रदान करने का आदेश हाईकोर्ट ने 6 दिसंबर 2023 को दिया था। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि यह पूरी प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी की जाए, लेकिन संबंधित अधिकारियों ने लंबे समय तक आदेश का पालन नहीं किया।  

इसके बाद याचिकाकर्ता द्वारा अवमानना याचिका दायर की गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अधिकारी बार-बार अलग-अलग कारण बताते हुए समय मांगते रहे। कभी कहा गया कि मामला आयुक्त के पास लंबित है, तो कभी यह तर्क दिया गया कि आदेश के खिलाफ रिट अपील दायर की गई है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल अपील दायर करना, अदालत के आदेश का पालन न करने का आधार नहीं हो सकता, विशेषकर तब जब उच्च अदालत से कोई स्थगन आदेश प्राप्त न हुआ हो।  

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि अधिकारियों को कई बार चेतावनी दी गई, यहां तक कि अदालत ने 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया, फिर भी आदेश का पालन नहीं किया गया। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिकारियों ने विभिन्न बहानों के माध्यम से समय प्राप्त किया और आदेश का पालन करने की कोई वास्तविक इच्छा नहीं दिखाई। यह आचरण अदालत की अवमानना की श्रेणी में आता है।  

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि इस मामले की कुल 22 बार सुनवाई हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद आदेश का पूर्ण पालन नहीं हुआ। सुनवाई के दौरान अधिकारियों ने 12 मार्च 2026 को नियमितीकरण का आदेश पारित करने की जानकारी दी, लेकिन अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता को उससे जुड़े परिणामी लाभ अभी तक नहीं दिए गए हैं, इसलिए आदेश का पालन अधूरा माना जाएगा।  

इन परिस्थितियों में न्यायालय ने अधिकारियों को अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुए दो महीने की साधारण कारावास की सजा सुनाई। हालांकि अदालत ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए इस सजा को तीन सप्ताह के लिए स्थगित रखा है, ताकि अधिकारी आदेश का पूर्ण पालन कर सकें। यदि निर्धारित समय में आदेश का पालन नहीं हुआ, तो सजा लागू हो सकती है।  

इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रसन्ना भटनागर ने प्रभावी पैरवी करते हुए अदालत के समक्ष बार-बार आदेश की अवहेलना का मुद्दा उठाया, जिसके बाद न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय सरकारी अधिकारियों के लिए स्पष्ट संदेश है कि अदालत के आदेशों की अवहेलना करने पर उन्हें व्यक्तिगत रूप से दंडित किया जा सकता है और कानून के समक्ष सभी समान हैं।

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