सम्पादकीय
भारत की चिंता का विषय यह भी रहा है कि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के समय बांग्लादेश की पाकिस्तान से निकटता अप्रत्याशित तरीके से बढ़ी। यदि यह निकटता कम नहीं हुई तो भारत के साथ खुद बांग्लादेश के लिए खतरा बढ़ेगा। बांग्लादेश को यह भूलना नहीं चाहिए कि उसे पाकिस्तान की बर्बरता से मुक्ति और आजादी भारत के सहयोग से ही मिली थी।
लंबे समय तक अस्थिरता-अराजकता से जूझते रहे बांग्लादेश के चुनाव परिणाम इस देश को स्थिरता प्रदान करते दिख रहे हैं। इसका कारण यह है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी सरकार बनाने के लिए आवश्यक सीटों से कहीं अधिक सीटें जीतने में सफल रही और उसके नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया।
बांग्लादेश के चुनाव आम तौर पर शांतिपूर्ण रहे, लेकिन उन्हें निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को प्रतिबंधित कर चुनाव लड़ने से रोक दिया गया। तथ्य यह भी है कि मुख्य विपक्षी दल के रूप उभरी जमात-ए-इस्लामी चुनाव नतीजों को स्वीकार करने में आनाकानी करती दिख रही है। बांग्लादेश में हमेशा चुनावों की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
चूंकि कट्टरपंथी और पाकिस्तानपरस्त जमात-ए-इस्लामी परास्त हो गई, इसलिए भारत राहत की सांस ले सकता है, लेकिन यह ध्यान रहे कि उसे उम्मीद से कहीं अधिक सीटें मिलीं। जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर चुनाव लड़ी छात्रों की पार्टी नेशनल सिटीजन पार्टी को कोई खास सफलता न मिलना भी भारत के लिए राहतकारी है।
इन्हीं छात्रों ने जुलाई 2024 में शेख हसीना सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था, जिसके नतीजे में उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी थी। भारत विरोधी तेवर अपनाए नेशनल सिटीजन पार्टी का हश्र यही बताता है कि उसका आंदोलन न तो किसी क्रांति का परिचायक था और न ही किसी सकारात्मक बदलाव का।
चूंकि बांग्लादेश में चुनाव के साथ संवैधानिक बदलावों पर जनमत संग्रह भी हुआ, इसलिए वहां नई सरकार के गठन के साथ ही राजनीतिक ढांचे में परिवर्तन होना तय है। यह स्वाभाविक है कि बांग्लादेश की नई सरकार के रवैये पर भारत की गहरी निगाह होगी।
भारत को न केवल यह देखना होगा कि बांग्लादेश की नई सरकार उसके हितों के प्रति संवेदनशीलता का परिचय देती है या नहीं, बल्कि यह भी कि वह कट्टरपंथियों समेत अन्य भारत विरोधी तत्वों पर लगाम लगाती है या नहीं? भारत को यह तो खास तौर पर देखना होगा कि इस पड़ोसी देश में हिंदुओं का दमन रुकता है या नहीं? बांग्लादेश की नई सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके यहां पूर्वोत्तर भारत के विद्रोही गुटों को शरण न मिले।
भारत की चिंता का विषय यह भी रहा है कि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के समय बांग्लादेश की पाकिस्तान से निकटता अप्रत्याशित तरीके से बढ़ी। यदि यह निकटता कम नहीं हुई तो भारत के साथ खुद बांग्लादेश के लिए खतरा बढ़ेगा। बांग्लादेश को यह भूलना नहीं चाहिए कि उसे पाकिस्तान की बर्बरता से मुक्ति और आजादी भारत के सहयोग से ही मिली थी।

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