अजय कुमार बियानी
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन पर समय‑समय पर बहस भी हुई और सम्मान भी। विनायक दामोदर सावरकर उन्हीं व्यक्तित्वों में से एक थे, जिन्हें समर्थक क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त के रूप में याद करते हैं तो आलोचक उनके विचारों पर प्रश्न भी उठाते हैं। उनकी पुण्यतिथि 26 फरवरी हमें यह अवसर देती है कि हम उनके जीवन, विचार और योगदान को संतुलित दृष्टि से समझें।
28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भागुर गांव में जन्मे विनायक दामोदर सावरकर का बचपन कठिन परिस्थितियों में बीता। अल्पायु में ही माता‑पिता का साया उठ गया, परंतु विपरीत परिस्थितियों ने उनके स्वभाव को और दृढ़ बनाया। प्रारंभिक शिक्षा नासिक में हुई और आगे की पढ़ाई के लिए वे पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज पहुँचे। छात्र जीवन से ही उनमें प्रखर राष्ट्रवादी चेतना दिखाई देने लगी थी।
सावरकर ने युवावस्था में ही संगठित राष्ट्रवादी गतिविधियों की शुरुआत कर दी थी। उन्होंने अभिनव भारत संस्था की स्थापना की और स्वदेशी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। विदेशी वस्त्रों की होली जलाने जैसे प्रतीकात्मक आंदोलनों से उन्होंने औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध जनभावना को उभारने का प्रयास किया। उनके भाषणों और लेखन में तीखा राष्ट्रवादी स्वर दिखाई देता था, जिसने ब्रिटिश शासन को उनके प्रति सतर्क कर दिया।
1906 में वे विधि अध्ययन के लिए इंग्लैंड गए, जहाँ उन्होंने भारतीय छात्रों को संगठित करने का प्रयास जारी रखा। इसी काल में उनकी प्रसिद्ध कृति “द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस 1857” तैयार हुई, जिसमें उन्होंने 1857 के विद्रोह को भारत की पहली स्वतंत्रता लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया। यह पुस्तक ब्रिटिश सरकार को इतनी असहज लगी कि इसके प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। बाद में यह गुप्त रूप से विदेश में छपकर भारत पहुँची।
1909‑10 के आसपास क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े आरोपों में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और अंततः उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाकर अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया। काला पानी की कठोर यातनाओं के बीच भी उनका लेखन और चिंतन जारी रहा। कहा जाता है कि उन्होंने जेल की दीवारों पर कील और कोयले से कविताएँ लिखीं और उन्हें कंठस्थ कर लिया, जिन्हें बाद में पुनः लिपिबद्ध किया गया।
1920 के दशक में उनकी रिहाई की मांग उठी और अंततः उन्हें रत्नागिरी में नजरबंद रखा गया। इसी अवधि में उन्होंने “हिंदुत्व” विषय पर अपने विचार व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किए। रिहाई के बाद उन्होंने सामाजिक सुधार, विशेषकर अस्पृश्यता उन्मूलन और हिंदू समाज में संगठन पर बल दिया। 1937 में वे अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने और सक्रिय राजनीतिक भूमिका में आए।
स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम चरण में उनके विचार और रणनीतियाँ कई बार मुख्यधारा नेतृत्व से भिन्न रहीं। महात्मा गांधी की हत्या के बाद उनका नाम भी आरोपों में आया, किंतु साक्ष्यों के अभाव में न्यायालय ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया। यह प्रकरण उनके सार्वजनिक जीवन पर लंबे समय तक छाया रहा।
स्वतंत्र भारत में सावरकर वैचारिक लेखन और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे। उन्हें पुणे विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट की मानद उपाधि भी प्रदान की गई। जीवन के अंतिम चरण में उन्होंने 1 फरवरी 1966 से स्वेच्छा से अन्न‑जल त्याग का निर्णय लिया और 26 फरवरी 1966 को मुंबई में उनका निधन हो गया।
वीर सावरकर का व्यक्तित्व अनेक आयामों से बना था—वे क्रांतिकारी भी थे, लेखक भी; राजनीतिक चिंतक भी थे और सामाजिक सुधार के पक्षधर भी। उनके जीवन का मूल्यांकन करते समय भावनाओं के बजाय तथ्यों और संदर्भों को समझना अधिक आवश्यक है। इतिहास किसी एक रंग से नहीं लिखा जाता; उसमें विचारों की विविध धाराएँ होती हैं।
आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करते हुए यह स्वीकार करना होगा कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और वैचारिक परंपरा में उनका स्थान महत्वपूर्ण है। साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि उनके विचारों पर गंभीर और संतुलित विमर्श जारी रहे। राष्ट्र के इतिहास को समझने का यही परिपक्व और लोकतांत्रिक तरीका है।
वीर सावरकर को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।

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