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ट्रेड डील हो गई - टीस बाक़ी रह गई The trade deal was done – but the bitterness remained.

 


                      ..• रवि उपाध्याय 


ऑपरेशन सिंदूर के बाद आई खटास के करीब एक साल बाद आखिर मंगलवार का अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील, यानि व्यापार समझौता हो ही गया। इस डील से किस देश को कितना फायदा या कितना नुक्सान हुआ इसकी पूरी जानकारी तो समझौते का प्रारूप सामने आने के बाद ही हो सकेगा। इस पर अभी दोनों देशों के बीच मौखिक सहमति बनी है। इसके अनुसार अमेरिका ने भारतीय उत्पादों को अमेरिका निर्यात किए जाने पर पूर्व घोषित टैरिफ (25+25) यानि टैक्स 50 फीसद से घटा कर अमेरिका द्वारा 18 प्रतिशत कर दिया गया है। इसका असर भारत के निर्यातकों पर सीधा तो नहीं पड़ेगा। हां इस टेरिफ का भार अमेरिका के उस उपभोक्ता की जेब पर होगा जो यह उत्पाद खरीदेगा। उसे अब पहले से ज्यादा दाम चुकाने होंगे।


इसे इस तरह समझि लीजिए अमेरिका को यदि कोई 100 रुपए मूल्य का भारतीय उत्पाद निर्यात किया जाता है और अमेरिका उस पर 18 प्रतिशत टैक्स लगाता है तो यह उत्पाद अमेरिका में 118 रुपए का हो जाएगा । इस मूल्य वृद्धि का भार अंततः वहां के उपभोक्ताओं को ही उठाना होगा न कि हमारे देश के निर्यातकों को। अब यह तर्क दिया जा सकता है कि इस भाव वृद्धि से भारत के उत्पादों की अमेरिका में खपत कम हो जाएगी और भारतीय उत्पाद कम मात्रा में बिकेगा पर ऐसा होता नहीं है।

अर्थ शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार यदि वस्तु की क्वालिटी बेहतर है और उसी गुणवत्ता तथा रेट पर कोई दूसरा विकल्प बाज़ार में उपलब्ध नहीं है तो फिर उपभोक्ता मजबूरन ही में ही सही परंतु वही उत्पादन क्रय करता है जो वह पहले से उपयोग करता चला आ रहा है। दुनियां के हर एक बाजार में ग्राहक की यही मनोवृत्ति होती है। वह नई चीज या उत्पाद आसानी से स्वीकार नहीं करता। यही मनोवृति हमारे देश की उपभोक्ता की भी है। इसे पार्ले जी के बिस्कुट से समझा जा सकता है। बाजार में अनेक अन्य ब्रांड के बिस्किट मौजूद हैं लेकिन उपभोक्ता की पहली पसंद यही है। भले ही पैकेट में बिस्किट्स की मात्रा कम हो गई हो या उसके दाम ही क्यों न बढ़ गए हों।

अमेरिका को किए जाने वाले भारत के निर्यात पर खतरा इसलिए भी नहीं है कि जो उत्पाद या वस्तु हम यूएस को निर्यात करते हैं वही उत्पाद हमारे पड़ोसी देश भी निर्यात करते हैं। परंतु इन देशों पर अमेरिका ने हम से अधिक टेरिफ लगाया हुआ है। इनमें पाकिस्तान, इंडोनेशिया पर टैरिफ 19,वियतनाम और बांग्लादेश पर 20 प्रतिशत और चीन पर 34 प्रतिशत लगाया गया है। इसके चलते इन देशों का सामान अमेरिका में महंगा होगा।

इसलिए टली डील :अमेरिका और भारत के बीच इस व्यापार समझौता में दर के कई कारण है। इसमें एक कारण है ट्रंप का अहंकार और स्वयं के दुनिया के चौधरी होने का भाव। दूसरा कारण है नोबेल शांति पुरस्कार में भारत द्वारा ट्रंप के नाम का प्रस्ताव का अनुमोदन नही करना। इसके अलावा अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान के खिलाफ भारत द्वारा पहलगाम में 26 निरीह पर्यटकों की पाकिस्तानी पिट्ठुओं द्वारा की अमानवीय हत्याएं के बाद भारत द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के तहत की गई घातक सैन्य कार्रवाई से खुश नहीं थे । क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर के तहत की गई मिसाइल अटैक में पाकिस्तान के किराना पहाड़ियों पर भारत द्वारा किया गया घातक हमला। किराना पहाड़ियों में परमाणु हथियार का भंडार छिपा कर रखा गया था। उसको गंभीर क्षति पहुंची

कहा यह जाता है कि यह परमाणु हथियार पाकिस्तान के नहीं बल्कि अमेरिका के हैं या वे हथियार अमेरिका की निगरानी में हैं। इससे अमेरिका भारत की सामरिक शक्ति से तिलमिला गया और जब भारत ने 48 घंटों में पाकिस्तान स्थित आतंकी अड्डों, 9 से अधिक एयर बेस को बरबाद कर जब ऑपरेशन सिंदूर को पाकिस्तान के डीजीएमओ की गुहार पर रोका तो प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप चाहते थे कि उक्त सीजफायर कराने का श्रेय उन्हें मिले ताकि नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उनका दावा मजबूत हो सके। बता दें कि ट्रंप ऑपरेशन सिंदूर को रुकवाने का दावा वे अब तक लगातार 75 से अधिक बार कर चुके हैं। इसके अलावा डील में देर होने के कई और भी कारण हैं। इस पर चर्चा न करते हुए हम मूल मुद्दे व्यापार समझौते पर आते हैं।

ट्रंप पर घरेलू दबाव : इस डील का श्रेय यदि किसी को जाता है तो वह भारत के मौन और धैर्य को। इस दौरान अमेरिका के प्रेसिडेंट ट्रंप सहित वहां के सेक्रेटरी फाइनेंस, वाइस प्रेसिडेंट जेडी वैंस,विदेश मार्को रूबियो वाचाल रह भारत पर दवाब बनाने की नाकाम कोशिश करते रहे। लेकिन भारत के विदेश तथा वाणिज्य मंत्री और स्वयं प्रधानमंत्री मोदी शांत चित्त हो कर यह कहते रहे कि हम भारत के हितों से कतई समझौता नहीं करेंगे। भारत सरकार के इस रूख से ट्रंप सरकार विचलित हो गैर जरूरी बयानबाजी करती रही। इससे उनकी छबि विश्व भर में प्रभावित हुई।

मदर ऑफ डील : ट्रंप के ऊपर घरेलू दबाव तो पहले से ही था। उन्हें न केवल अपने रिपब्लिक नेताओं बल्कि विपक्षी डेमोक्रेट्स सांसदों का विरोध का सामना करना पड़ रहा था। उन पर भारत से तुरन्त ट्रेड डील करने का दबाव था। इसमें आग में घी डालने का काम उस वक़्त हो गया जब 27 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में यूरोपियन यूनियन और भारत के बीच डील हो गई। इसे दुनियां में मदर ऑफ आल डील्स कहा गया। बता दें कि यूरोपियन यूनियन में 27 देश शामिल हैं। इससे घबरा कर ही अमेरिका भारत से ट्रेडडील करने को मजबूर हुआ। यदि वह ऐसा नहीं करता तो अगले साल 2017 में अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों में डोनल्ड ट्रंप की मुश्किलें और भी बहुत बढ़ जाती। उनकी पहले से ही काफी किरकिरी हो चुकी थी।

भारत का मस्तक ऊंचा रहा : देर से हुई इस डील से भारत का पूरी दुनिया में मस्तक ऊंचा हुआ है। दुनियां यह जान गई कि ट्रंप की 500 प्रतिशत टैरिफ तक की धमकी के बाद भी भारत झुका नहीं। बल्कि अपने व्यापार की भरपाई के लिए भारत ने अन्य देशों से व्यापार समझौते किए। ग्रेट ब्रिटेन, यूएई, आसियान देश, जापान, कोरिया संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया और सार्क देश, मॉरिशस आदि से मुक्त व्यापार समझौते किए गए।

परस्पर हितों का ध्यान : भारत और यूएस के साथ हुए समझौते में दोनों देशों ने अपने परस्पर अपने हितों का ध्यान रखा। भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कल मंगलवार को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि भारत ने अमेरिका से हुई ट्रेड डील में हमने अपने कृषि और डेयरी क्षेत्रों को पूरी तरह से सुरक्षित रखा है। उन्होंने जोर दे कर कहा कि हमने अपने किसानों और डेयरी क्षेत्रों के हितों से कतई समझौता नहीं किया है और न ही आगे भी ऐसा करेंगे।

टीस बाकी रह गई : दोनों देशों के बीच ट्रेड डील तो हो गई, लेकिन इस डील होने के पहले प्रेसिडेंट ट्रंप और उनके सचिवों ( मंत्रियों ) ने जिस तरह धमकी भरे बयान दिए और आतंक को पनाह देने वाले देशों को जिस तरह संरक्षण देने की कोशिश की वह पूरे देश के जन मन में एक टीस छोड़ गई। खुद को लोकतंत्र का प्रहरी होने का जोरशोर से दावा करने वाला यूएसए आतंकी देश के साथ जब गलबहियां करता है तब उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं वो झूठ तो नहीं बोल रहा है। क्योंकि ट्रंप की अपने ही देश और दुनिया में बे इंतहा झूठ बोलने के आरोप लगते रहे हैं।

समझौते पर हस्ताक्षर होना बाकी : मंगलवार को भारत अमेरिका के बीच जो ट्रेड डील पर सहमति बनी है उस पर दोनों देशों के बीच औपचारिक लिखित करार होना बाकी है। इस बारे में ड्रॉफ्ट दस्तावेज तैयार होंगे और उस पर दोनों देशों के ट्रेड, वाणिज्य विभाग के संबंधित अधिकारियों के हस्ताक्षर होने के बाद ही डील पक्की मानी जाएगी। ड्राफ्ट सामने आने के बाद ही तभी विस्तृत विवरण सामने आ सकेगा।

विपक्ष का आरोप : कल मंगलवार को जैसे ही अमेरिका के प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने डील होने की जानकारी सोशल मीडिया ट्रुथ पर दी भारत का विपक्ष अचानक हुई घोषणा से हतप्रभ रह गया। लोकसभा में हंगामा होने लगा।सरकार पर विपक्ष द्वारा किसानों के हितों से समझौता करने के आरोप लगने लगे। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर कंप्रोमाइज्ड होने का आरोप लगा दिया गया। विपक्षी संसद सदस्यों ने नरेंदर - सरेंडर जैसे नारे दोहराए। विपक्ष ऑपरेशन सिंदूर को भारत सरकार द्वारा रोका जाने के बाद से इस तरह के नारे लगातार लगाता चला आ रहा है।

इसका एक कारण निर्वाचन आयोग द्वारा बारह राज्यों की मतदाता सूचियों का करवाया जा रहा विशेष गहन पुनरीक्षण तो है ही, साथ ही गत वर्ष 2025 में बिहार विधानसभा चुनावों में विपक्ष को मिली करारी हार भी इसका एक कारण है। वह निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर भाजपा के एजेंट की तरह काम करने का आरोप लगाता चला आ रहा है। एसआईआर के खिलाफ विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट भी गए परंतु उन्हें वहां अपेक्षा अनुसार सफलता नहीं मिल सकी। इससे भी विपक्षी दल निराश और आक्रोशित हैं।

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