• रवि उपाध्याय
जोरदार हंगामे के साथ 1 फरवरी को प्रारंभ हुआ 18 वीं लोकसभा का दूसरे साल के बजट सत्र का प्रथम चरण हंगामे के साथ शुक्रवार 13 फरवरी को पूरा हो गया। बजट सत्र का दूसरा चरण 09 मार्च से प्रारंभ होगा।
बजट सत्र के प्रथम चरण में कुछ अत्यंत ही अप्रिय घटनाएं हुईं। इनमें ऐतिहासिक घटना थी प्रधानमंत्री मोदी का लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद न व्यक्त कर सकना। वजह थी सदन में प्रधानमंत्री की सीट को कांग्रेस की 6 महिला सांसदों ने अपने हाथों में पोस्टर और प्ले कार्ड्स के साथ घेर लिया था, ताकि प्रधानमंत्री मोदी को उनकी सीट तक जाने और उन्हें सदन को संबोधित करने से रोका जा सके।
दूसरी बड़ी घटना थी विपक्ष के नेता के खिलाफ राहुल गांधी के खिलाफ भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा सबस्टेंटिव मोशन की सूचना लोकसभा सचिवालय को देना। यदि यह मोशन पारित हो जाता है तो राहुल गांधी की संसद सदस्यता को बर्खास्त किया जा सकता है। यह भी दावा किया जा रहा है कि उनके भविष्य में चुनाव लड़ने पर भी रोक लग सकती है।
बजट सत्र की तीसरी बड़ी घटना स्पीकर के खिलाफ विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव लाना। 1987 के 39 सालों बाद यह पहला मौका है जब किसी लोकसभा स्पीकर के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया गया हो। चौथी बड़ी घटना है पूर्व आर्मी चीफ एमएम नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक (फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी) का स्पीकर द्वारा बार बार रूलिंग देने के बाद भी ,पाठन करने की सदन में जिद कर, राहुल गांधी द्वारा स्पीकर दी गई व्यवस्था की अवहेलना करना। इसके बाद संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजु ने उनके खिलाफ प्रिविलेज मोशन लाने की घोषणा कर उससे पलटना। बाद में भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी के विरुद्ध लोकसभा को उनके विरुद्ध सबस्टेंटिव मोशन लाने की सूचना दी ।
यह पहला मौका है जब किसी विपक्ष के नेता के खिलाफ इस तरह का प्रस्ताव लाया जा रहा है। इसके परिणाम स्वरूप उनको लोकसभा की सदस्यता तो जा ही सकती है। साथ ही उनके चुनाव लड़ने पर भी आजीवन रोक लग सकती है।
50 साल पहले स्वामी हुए थे बर्खास्त
भारत के संसदीय इतिहास में सुब्रमण्यम स्वामी एक मात्र ऐसे सांसद रहे हैं जिन्हें 15 नवम्बर 1976 को राज्यसभा की सदस्यता से बर्खास्त कर दिया गया था। किसी राज्यसभा सदस्य की सदस्यता को बर्खास्त करने का यह अब तक का पहला और अंतिम मामला है। उन पर विदेशों में देश और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को बदनाम करने का आरोप था।
इस बारे में सुब्रमण्यम स्वामी की पत्नी रोक्साना स्वामी ने अपनी पुस्तक 'इवोल्विंग विद सुब्रमण्यम स्वामी,अ रोलर कोस्टर राइड' में जिक्र किया है।अमेरिका से लौटने के बाद सुब्रमण्यम स्वामी आईआईटी दिल्ली में पढ़ाने लगे थे। भारतीय जनसंघ ने 1974 में उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्य सभा सांसद बना दिया । लेकिन देश में इमरजेंसी लगने के बाद सुब्रमण्यम स्वामी भूमिगत हो गए। इमरजेंसी के दौरान सुब्रमण्यम स्वामी पर देश विरोधी साजिशों में शामिल होने, संसद और देश के महत्वपूर्ण संस्थानों को बदनाम करने का आरोप लगा था । इसी आरोप में सुब्रमण्यम स्वामी को 15 नवंबर, 1976 को राज्यसभा से बर्खास्त कर दिया गया। स्वामी 1975 से 1977 के बीच इमरजेंसी के 19 महीनों में सरकार को छकाते रहे पर गिरफ्त में नहीं आए। जबकि उस दौरान ना केवल जनसंघ बल्कि विपक्ष के ज्यादातर नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था ।
रोचक किस्सा !
यह किस्सा तब का है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपातकाल लगा दिया गया था। इसके बाद सांसद सुब्रमण्यम स्वामी भूमिगत हो कर विदेशों में आपातकाल और सरकार की कड़ी निंदा करते घूम रहे थे। पुलिस उन्हें जी जान से खोज रही थी परंतु वे भेष बदल कर पुलिस को छका रहे थे।
इसी दौरान एक बार जब संसद का सत्र चल रहा था। सदन में दिवंगत सांसदों को श्रद्धांजलि दी जा रही थी। उसी दौरान सिक्ख के वेष में सदन में स्वामी सुरक्षा को चकमा दे कर सदन में जा पहुंचे।जब स्पीकर शोक प्रस्ताव पढ़ रहे थे तब सिक्ख बने स्वामी उठे उन्होंने कहा अध्यक्ष जी देश में लोकतंत्र भी मर गया है आप उसे श्रद्धांजलि देना भूल गए हैं। इसके बाद सदन में हड़कंप मच गया। सुरक्षाकर्मी उन्हें गिरफ्तार करने दौड़े पर वे सब को चकमा दे कर लापता हो कर अमेरिका जा पहुंचे।
क्या है सबस्टेंटिव प्रस्ताव ?
सब्सटेंसिव मोशन भारतीय संसदीय प्रक्रिया का एक स्वतंत्र प्रस्ताव होता है। इसे किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर सदन से स्पष्ट निर्णय लेने के लिए पेश किया जाता है। यह किसी अन्य प्रस्ताव या संशोधन पर आधारित नहीं होता, बल्कि अपने आप में पूर्ण और स्वतंत्र होता है। इसे संसद के किसी भी सदन, विशेष रूप से लोकसभा या राज्यसभा में पेश किया जा सकता है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य किसी नीति, निर्णय या सदस्य के आचरण से जुड़े मामले पर सदन की राय या फैसला लेना होता है।
जिस सांसद के खिलाफ यह प्रस्ताव लाया जाता है उसके अब तक के संपूर्ण आचरण पर चर्चा की जाती है। तदोपरांत प्रस्ताव पर निर्णय लिया जाता है। निर्णय में सदस्य के आचरण की निंदा कर उसे चेतावनी दे कर प्रकरण समाप्त किया जा सकता है या फिर उसकी मौजूदा सदन की सदस्यता से बर्खास्त किया जा सकता है। साथ ही उसके भविष्य में चुनाव लड़ने पर भी रोक लगाए जा सकती है।
सरकार में नहीं है साहस
मोदी सरकार की पिछले 10-12 साल की गतिविधियों को देखा जाए तो हम देखते हैं कि आंतरिक मामलों में सरकार कठोर कदम उठाने से डरती रही है। ऐसा लगता है कि वह यह कदम सियासी गुणा भाग को ध्यान में रख कर उठाने से कतरा ती रही है। सरकार में इंदिरा गांधी और उनकी सरकार जैसा कदम उठाने के साहस का अभाव दिखता है। अंततः सरकार विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ सदन में निंदा प्रस्ताव पास कर इस अध्याय का समापन कर देगी। इस तरह यह प्रस्ताव संसदीय इतिहास का अमिट हिस्सा बन जाएगा।
( लेखक राजनैतिक समीक्षक और एक व्यंग्यकार भी हैं।)
16022026

Post a Comment