ग्रीन अमोनिया: भविष्य की ऊर्जा और देश की शौर्य गाथा]
अब भारत सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि ऊर्जा का वैश्विक निर्माता]
· प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
दुनिया आज जीवाश्म ईंधनों की जकड़न में जकड़ी है, और हर देश ऊर्जा संकट की चपेट में है। लेकिन भारत ने इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए एक नई ऊर्जा क्रांति की अगुवाई शुरू कर दी है, जो ऊर्जा की भूख मिटाएगी और पर्यावरण को नया जीवन देगी। ग्रीन अमोनिया अब सिर्फ एक रसायन नहीं रहा—यह राष्ट्रीय सुरक्षा की ढाल, आर्थिक आत्मनिर्भरता की चाबी और 2070 के नेट-ज़ीरो लक्ष्य का सबसे तेज़ हथियार बन चुका है। जनवरी 2026 में इंडिया एनर्जी वीक पर प्रधानमंत्री द्वारा 500 अरब डॉलर के निवेश अवसरों की घोषणा ने इस बदलाव को वैश्विक मंच पर स्थापित कर दिया। नीतियां अब केवल कागज पर नहीं, बल्कि धरातल पर जिंदा हो रही हैं, और ग्रीन अमोनिया इस परिवर्तन का सबसे दमकता और ठोस प्रतीक बनकर उभरा है।
यह ग्रीन अमोनिया सीधे हवा से नाइट्रोजन और सौर-पवन ऊर्जा से हाइड्रोजन लेकर बनता है—एक भी ग्राम कार्बन छोड़े बिना। जबकि पारंपरिक ग्रे अमोनिया प्राकृतिक गैस जलाकर बनाया जाता है, जो उर्वरक क्षेत्र में अरबों टन कार्बन डाइऑक्साइड फैलाता है। लेकिन 2025 की एसईसीआई नीलामी ने इतिहास रच दिया—₹49.75 से ₹64.74 प्रति किलो की कीमतें यूरोप की एच2ग्लोबल से 40-50% सस्ती साबित हुईं। 13 उर्वरक संयंत्रों के लिए 7.24 लाख टन वार्षिक मांग सुनिश्चित की गई, और दस साल के स्थिर मूल्य अनुबंधों ने निवेशकों में नया विश्वास पैदा किया। यह दर अब ग्रे अमोनिया के करीब पहुँच चुकी है, और बहुत जल्द इसे पीछे छोड़ देगी।
राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन इस ऊर्जा क्रांति का मुख्य इंजन है। 2030 तक 5 मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य तेजी से साकार हो रहा है। साइट (स्ट्रैटेजिक इंटरवेंशन्स फॉर ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांज़िशन) योजना के ₹17,490 करोड़ प्रोत्साहन ने इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण और उत्पादन में तेजी ला दी। 15 कंपनियों को कुल 3000 मेगावाट वार्षिक क्षमता आवंटित हो चुकी है। ग्रीन अमोनिया मिशन का सबसे व्यावहारिक और ताकतवर पहलू यह है कि इसे भंडारण, परिवहन और उपयोग में आसानी से अपनाया जा सकता है। उर्वरक, नौवहन, स्टील और रिफाइनरी जैसे कठिन क्षेत्रों को डीकार्बनाइज करने में यह सबसे प्रभावी और भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरा है।
बड़े प्रोजेक्ट अब वास्तविकता की ओर बढ़ रहे हैं और भारत की ग्रीन ऊर्जा क्रांति को ठोस आकार दे रहे हैं। एनटीपीसी ग्रीन एनर्जी का पुदीमडका हब 7 गीगावाट इलेक्ट्रोलाइजर और 20 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा से लैस होगा, जो सालाना 2.5 मिलियन टन ग्रीन केमिकल्स अमोनिया, यूरिया और मेथनॉल उत्पादित करेगा। एनजीईएल-असागो का समझौता भारत का पहला बड़े पैमाने पर ग्रीन यूरिया प्लांट ला रहा है। एएम ग्रीन की काकीनाडा इकाई 1.5 मिलियन टन क्षमता वाली है, और यूनिपर के साथ 5 लाख टन वार्षिक ऑफटेक 2028 से यूरोप में निर्यात शुरू करेगा। गुजरात, ओडिशा और राजस्थान में हब तेजी से विकसित हो रहे हैं, और यह देश को वैश्विक ग्रीन अमोनिया मानचित्र पर अग्रणी बनाएंगे।
आर्थिक लाभ गहरा और तत्काल हैं। भारत दुनिया का प्रमुख अमोनिया आयातक है, और गैस मूल्य उतार-चढ़ाव से लगातार प्रभावित रहता है। ग्रीन अमोनिया के उत्पादन से आयात 30% तक घट सकता है, विदेशी मुद्रा बचेगी और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। यह मिशन 6 लाख से अधिक रोजगार पैदा करेगा, ₹1 लाख करोड़ जीवाश्म ईंधन आयात की बचत करेगा और 2030 तक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में बड़े पैमाने पर कटौती करेगा। सौर-पवन से ग्रीन अमोनिया उत्पादन की लागत दुनिया की सबसे कम है, और 2030 तक यह और गिरने की संभावना है। आईएसटीएस (इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम) छूट, ओपन एक्सेस और नवीकरणीय बैंकिंग जैसी नीतियां निवेश को तेजी से आकर्षित कर रही हैं।
नेट-ज़ीरो 2070 लक्ष्य में ग्रीन अमोनिया की भूमिका निर्णायक और अभूतपूर्व है। उर्वरक उद्योग में प्रक्रिया उत्सर्जन शून्य करना, स्टील निर्माण में डीआरआई को हरा हाइड्रोजन देना, और नौवहन में बंकर ईंधन के रूप में इसका उपयोग—ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ बैटरी या सीधे बिजली का विकल्प काम नहीं कर सकता। भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता पहले ही 263 गीगावाट पार कर चुकी है, और 2030 का 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य तेजी से पूरा होने की राह पर है। यह मजबूत आधार ग्रीन अमोनिया को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी और भरोसेमंद बनाता है। 2028 से निर्यात शुरू होने जा रहा है, और यूरोप, जापान तथा कोरिया जैसी बड़ी मांग देश इसके प्रमुख ग्राहक होंगे। अब भारत सिर्फ आयातक नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में अपनी नई पहचान बना रहा है।
हालांकि चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं—उच्च प्रारंभिक पूंजी, बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण, सप्लाई चेन का सुदृढ़ीकरण, प्रमाणीकरण और आधुनिक बंदरगाह ढांचे की आवश्यकता। लेकिन 2025-2027 निर्णायक वर्ष बनकर उभरेंगे। कीमतें तेजी से गिर रही हैं, तकनीक पूरी तरह परिपक्व हो रही है, और नीतियां पहले से कहीं अधिक मजबूत हैं। एसईसीआई का डिमांड एकत्रीकरण और लंबी अवधि अनुबंध मॉडल न केवल वैश्विक मानक स्थापित करने की क्षमता रखता है, बल्कि भारत की ग्रीन ऊर्जा क्रांति को स्थायी, निर्णायक और प्रभावशाली रूप देने वाला निर्णायक स्तंभ भी बनेगा।
ग्रीन अमोनिया अब केवल ऊर्जा का साधन नहीं, बल्कि भारत की नई पहचान बन चुका है—आत्मनिर्भर, हरित और साहसिक। जब पूरी दुनिया जलवायु संकट की पकड़ में संघर्ष कर रही है, भारत अपनी रणनीतिक सोच और नवाचार से ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर रहा है और वैश्विक मंच पर नेतृत्व का अधिकार जता रहा है। यह मार्ग कठिनाइयों और चुनौतियों से भरा है, लेकिन अवसरों की संभावनाओं से भी संपन्न है। अब भारत सिर्फ सपनों का निर्माण नहीं कर रहा; वह उन्हें वास्तविकता में बदल रहा है। यही वह समय है जब बदलाव अपरिहार्य है, और भारत उसी बदलाव का साहसिक अग्रदूत बनकर भविष्य की ऊर्जा और पर्यावरण की दिशा को नई ऊँचाई पर ले जा रहा है।

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