अजय कुमार बियानी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर एक सामान्य धारणा यह है कि जो कुछ दिखाई देता है, वही संघ का कार्य है। वास्तव में यह धारणा ही संघ को समझने में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। जो कार्य समाज में दिखाई देते हैं—सेवा, राहत, संगठन, जागरण—वे संघ के स्वयंसेवकों के कार्य हैं, स्वयं संघ का नहीं। संघ का मूल कार्य अत्यंत सरल है—शाखा चलाना। शाखा वह स्थान है जहाँ मनुष्य का निर्माण होता है। और यह सुनिश्चित करना कि ऐसा ही वातावरण पूरे देश में बने, बस यही संघ का कार्य है। इसी भाव को एक वाक्य में कहा गया है—“संघ कुछ नहीं करता और स्वयंसेवक कुछ भी छोड़ते नहीं, सब कुछ करते हैं।” यह बात संघ 1925 से लगातार समझा रहा है, परंतु पूर्वाग्रह के कारण बहुतों को यह समझ में नहीं आती।
संघ को लेकर एक और सत्य यह है कि उसकी तुलना किसी अन्य संगठन से नहीं की जा सकती। आज की दुनिया में संघ जैसा कोई दूसरा मॉडल नहीं है। यही कारण है कि संघ को समझने के लिए सामान्य मापदंड असफल हो जाते हैं। संघ को केवल पढ़कर नहीं जाना जा सकता। स्वयं परम पूजनीय गुरुजी ने कहा था कि सरसंघचालक रहते हुए भी उन्हें संघ को समझने में वर्षों लगे। इसका अर्थ यह नहीं कि संघ समझ से परे है, बल्कि यह कि संघ को समझने के लिए सही दृष्टि आवश्यक है।
संघ को जानने का एक ही मार्ग है—हृदय में सकारात्मकता, मन में वास्तविक जिज्ञासा और दृष्टि में श्रद्धा। बिना पूर्वाग्रह के, खुले मन से जब कोई व्यक्ति संघ का अनुभव करता है, तब धीरे-धीरे संघ उसे समझ में आने लगता है। यह एक जीवनपर्यंत चलने वाली साधना है। परंतु यदि कोई संघ को पहले से तय निष्कर्षों के साथ देखेगा, तो उसे संघ कभी समझ में नहीं आएगा।
अक्सर लोग स्वयंसेवक को देखते हैं, उसके कार्य को देखते हैं और कहते हैं—यही संघ है। जबकि वास्तविक संघ वह है, जहाँ से उस सोच और उस कर्म की प्रेरणा जन्म लेती है। संघ अपने स्वयंसेवकों पर विश्वास करता है, क्योंकि वे संघ विचार के संस्कारों से निकलकर समाज में कार्य करते हैं। संघ जानता है कि विचारशील स्वयंसेवक जो भी करेगा, समाज के हित में ही करेगा।
संघ का विचार कोई नया या अलग विचार नहीं है। यह भारत की सामूहिक चेतना का विचार है। स्वतंत्रता से पूर्व देश के उत्थान के लिए कार्य करने वाले महापुरुषों के अनुभवों से जो निष्कर्ष निकले, संघ ने उन्हें कार्यरूप देने का दायित्व लिया। उन सभी का मूल चिंतन यही था कि देश का भाग्य बदलने के लिए हमें अपनी कमजोरियाँ छोड़कर, अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के लिए एक साथ जीना और मरना सीखना होगा। इसी आदत को पुनर्जीवित करने के लिए डॉ. हेडगेवार ने 1925 में संघ की स्थापना की।
भारत की पहचान उसकी विविधता में निहित एकता है। अनेक भाषाएँ, पंथ, परंपराएँ, खान-पान और वेशभूषाएँ होने के बावजूद एक सांस्कृतिक सूत्र हमें जोड़ता है। यही सांस्कृतिक अस्मिता हमारी राष्ट्रीय पहचान है। भारत की सीमाओं के भीतर जन्मा और पला कोई भी व्यक्ति, चाहे उसकी पूजा पद्धति या राजनीतिक विचार कुछ भी हों, उसके भीतर देशभक्ति का स्वर अवश्य झंकृत होता है। भारत माता का स्मरण उसके मन में स्वाभाविक रूप से देशप्रेम जगाता है।
हिंदू शब्द को लेकर भी भ्रम फैलाया गया है। हिंदू कोई पंथ या संप्रदाय नहीं, बल्कि वह जीवन दृष्टि है जो सभी पंथों का सम्मान करती है और स्वयं अपनी आस्था पर श्रद्धा से चलती है। इसी कारण संघ हिंदू संगठन की बात करता है। संघ का कार्य किसी के विरोध में नहीं, बल्कि हिंदू समाज को संगठित, सशक्त और चरित्रवान बनाने के लिए है। गुरुजी के शब्दों में, यदि संसार में कोई अन्य मत न भी होता, तब भी संघ का कार्य चलता, क्योंकि यह कार्य समाज के उत्थान के लिए है, विरोध के लिए नहीं।
संघ की पद्धति सरल और स्पष्ट है—पहले स्वयं को ठीक करो, उदाहरण बनो, और फिर दूसरों के लिए जियो। मनुष्य जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, परोपकार के लिए है। राष्ट्रीय भावना से जीवन का आरंभ हो, तभी अंतरराष्ट्रीय बंधुत्व सार्थक होता है। त्याग, सेवा और अनुशासन से युक्त मनुष्य का निर्माण करने वाली प्रयोगशाला का नाम ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है।
1940 के बाद संघ के बढ़ते स्वरूप से राजनीतिक सत्ता असहज हुई और दुष्प्रचार आरंभ हुआ। परंतु स्वयंसेवकों की तपस्या ने समय के साथ सब कुछ स्पष्ट कर दिया। 1963 की दिल्ली गणतंत्र दिवस परेड में संघ की सहभागिता, आपातकाल के समय लोकतंत्र की रक्षा और विभिन्न क्षेत्रों में स्वयंसेवकों की भूमिका ने समाज की दृष्टि बदल दी। यह सब इसलिए संभव हुआ क्योंकि संघ का विचार सत्य है, उसका अधिष्ठान शुद्ध है और उसकी कार्यपद्धति सुदृढ़ है।
संघ का उद्देश्य केवल भारत ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व को सुखी और समृद्ध बनाना है। और इसके लिए भारत का सशक्त होना आवश्यक है। संघ को जानना हो तो किसी बहस या धारणा के माध्यम से नहीं, बल्कि निकट की किसी शाखा में जाकर अनुभव करना चाहिए। संघ को समझने का इससे सरल और सच्चा कोई मार्ग नहीं है।
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