अजय कुमार बियानी
देश की प्रगति के चमकदार दावों के बीच एक तस्वीर बार‑बार सामने आती है—कंधों पर गठरियाँ, हाथों में रोटी, आँखों में उम्मीद और पैरों में मजबूरी की रफ्तार। यह केवल कुछ परिवारों की यात्रा नहीं, बल्कि उस सच्चाई का दस्तावेज है जिसे हम अक्सर आँकड़ों और घोषणाओं के शोर में सुनना ही नहीं चाहते। यह तस्वीर बताती है कि विकास की राह पर अभी भी कई लोग पीछे छूट रहे हैं।
जब कुछ श्रमिक परिवारों से बात हुई तो उनके शब्दों में शिकायत कम और विवशता अधिक थी। वे किसी रोमांचक सफर पर नहीं निकले, बल्कि पेट की आग बुझाने की तलाश में घर की चौखट पार कर रहे हैं। उनके लिए यह यात्रा दूरी की नहीं, मजबूरी की है—गांव से पलायन, स्कूल से पलायन, अपनेपन से पलायन और अंततः उस व्यवस्था से पलायन, जो रोजगार देने का दावा करती है।
इन महिलाओं के हाथों में सधी हुई रोटी और हाथ से कूटी मिर्च केवल भोजन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का प्रतीक है। वे भीख नहीं मांग रहीं; वे काम मांग रही हैं। उनके चेहरों पर थकान जरूर है, पर उम्मीद अब भी जिंदा है कि कहीं तो ऐसा ठिकाना मिलेगा जहाँ मेहनत का पूरा दाम मिल सके। यह उम्मीद ही उन्हें लगातार आगे बढ़ने की ताकत देती है।
सबसे अधिक चिंता की बात बच्चों की स्थिति है। एक किशोर छात्र, जिसकी परीक्षाएँ नजदीक थीं, अब जीवन की दूसरी परीक्षा देने निकल पड़ा है—रोटी की परीक्षा। जब शिक्षा और आजीविका आमने‑सामने खड़ी हो जाएँ और परिवार को दूसरा विकल्प चुनना पड़े, तो यह केवल एक परिवार की नहीं, पूरी व्यवस्था की असफलता मानी जानी चाहिए। पीछे बैठी वह बालिका, जिसने कुछ वर्ष पहले ही स्कूल को अलविदा कह दिया, दरअसल उन लाखों अधूरे सपनों का चेहरा है जो आर्थिक मजबूरी के कारण समय से पहले ही बड़े हो जाते हैं।
इन गठरियों में सिर्फ कपड़े और राशन नहीं बंधा होता; इनमें भविष्य की अनिश्चितता भी बंधी होती है। हर साल ऐसे दृश्य सामने आते हैं, और हर बार हम इसे एक मौसमी खबर समझकर आगे बढ़ जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर क्यों वर्षों से यह चक्र टूट नहीं पा रहा? यदि गरीबों के लिए खाद्यान्न और रोजगार योजनाएँ पर्याप्त हैं, तो फिर इतनी बड़ी संख्या में लोग घर छोड़ने को मजबूर क्यों होते हैं?
यह भी सच है कि सरकारी स्तर पर अनेक योजनाएँ चल रही हैं, जिनका उद्देश्य गरीबों तक राहत पहुँचाना है। परंतु जमीनी स्तर पर इन योजनाओं की पहुँच और प्रभावशीलता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। केवल राशन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं; स्थायी रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्थानीय स्तर पर अवसर पैदा करना ही पलायन की वास्तविक रोकथाम कर सकता है।
एक और विडंबना यह है कि कई युवाओं के हाथ में अब स्मार्टफोन तो है, पर स्थिर काम नहीं। तकनीक की पहुँच बढ़ी है, पर आर्थिक सुरक्षा उतनी नहीं बढ़ पाई। यह अंतर बताता है कि विकास का स्वरूप अभी भी असंतुलित है। यदि डिजिटल प्रगति के साथ रोजगार के अवसर समान गति से नहीं बढ़ेंगे, तो ऐसी तस्वीरें बार‑बार सामने आती रहेंगी।
समाधान कठिन नहीं, लेकिन प्राथमिकताएँ स्पष्ट होनी चाहिए। ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा, कौशल विकास का वास्तविक क्रियान्वयन, स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की समय पर पहचान और परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा का मजबूत ढांचा—ये कदम पलायन की गति को काफी हद तक रोक सकते हैं। साथ ही, नीति निर्माण में यह समझ भी जरूरी है कि पलायन केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, सामाजिक और शैक्षिक चुनौती भी है।
यह तस्वीर हमें झकझोरती है, लेकिन साथ ही चेतावनी भी देती है। यदि हम इसे केवल भावनात्मक दृश्य मानकर भूल जाएंगे, तो आने वाले वर्षों में ऐसी कतारें और लंबी होती जाएंगी। विकास का असली अर्थ तभी पूरा होगा जब किसी परिवार को रोटी की तलाश में अपना घर, स्कूल और सपने छोड़ने की मजबूरी न रहे।
आखिरकार, किसी भी राष्ट्र की प्रगति का पैमाना ऊँची इमारतें नहीं, बल्कि वह मुस्कान है जो अपने घर में सुरक्षित रहकर भी कायम रह सके। जब तक रोटी की तलाश में यह अनवरत पलायन जारी है, तब तक हमें आत्ममंथन करते रहना होगा—कहीं हमारी विकास यात्रा में कुछ महत्वपूर्ण छूट तो नहीं रहा।


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