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बकरे की जान और बजट ....The goat's life and the budget...

     • रवि उपाध्याय 


रविवार को केंद्र सरकार ने लोकसभा में बजट पेश कर दिया। यह हर साल पेश किया जाता है तो इस साल भी पेश कर दिया गया है । इसमें कुछ नया पुराना हो या न हो यह अलग बात है। यदि इसमें कुछ नया है तो वह यह है कि इस बार बजट रविवार, सॉरी इतवार को पेश किया गया। इस दृष्टि से यह सदी की बड़ी घटना है।भला यह भी कोई बात हुई।नेताओं,अफसरों और आम आदमी की छुट्टी का दिन बरबाद कर दिया। आराम से सैर सपाटा करते, इक्चर - पिक्चर देखते, चादर तानकर सोते। सुरा पान करते पर सब प्रोग्राम चौपट कर दिया।


हमारे मित्र छेदी बाबू की शिकायत थी कि यह बजट दो फरवरी को पेश किया जाता तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता । हमने उन्हें टोकते हुए कहा छेदी बाबू तब ये लोग कहते ये दो नंबर का बजट है, इसीलिए परंपरा को तोड़कर अगले दिन दो फरवरी को पेश किया गया है। तब ये कहते हम तो बजट के लिए छुट्टी के दिन भी संसद में आकर बड़ी कुर्बानी देने को तैयार थे। 

कुछ लोगों द्वारा यह सवाल उठाया जा सकता है कि हो ऊपर की लाइनों में रविवार के साथ इतवार शब्द का उपयोग क्यों किया गया है, जबकि दोनों का मतलब एक ही है । तो साफ कर दें कि दोनों शब्दों का अर्थ भले ही एक हो परंतु पहला शब्द नेताओं को सांप्रदायिक लग सकता है इसलिए इतवार शब्द का उपयोग किया गया है। सेक्यूलरों को यह शब्द सूट करता है।

छेदी बाबू को दूसरी आपत्ति यह थी कि मुहावरा बकरे की जान गई.. गलत है, मुहावरा में सही शब्द है मुर्गे की जान गई और खाने वाले को मज़ा भी नहीं आया। हमने कहा कि भाई बकरा शब्द इसलिए उपयोग किया गया क्योंकि देश में सबसे ज्यादा बकरे ही हलाल होते हैं। दूसरे नेताओं द्वारा आजादी के बाद से लगातार जनता को बकरा बनाया जा रहा है। यहां जानबूझ कर मुर्गे का जिक्र इसलिए नहीं किया गया है क्योंकि मुझे मुर्गे से कई वजहों से नफरत है। एक तो यह सुबह सुबह बांग देकर नींद खराब कर देता है। आजादी के बाद से ये रोज बांग दे रहा है पर जनता है कि उसकी नींद ही नहीं टूट रही है। दूसरे यह कि इसको देख सुनकर स्कूल और टीचर की याद आ जाती है। उन्होंने हमें खूब मुर्गा बनाया है तब से ही हम को मुर्गा न पसंद है। तीसरे इसका जिक्र इसलिए नहीं किया क्योंकि इसके सिर की लाल कलगी के कारण किसी पार्टी को इसका उल्लेख बुरा लग सकता है।

छेदी बाबू का दूसरा सवाल था यह बताईए कि बकरे और बजट का जनता से क्या संबंध है। हमने कहा वही संबंध होता है जो चाकू और खरबूजे का होता है। इसमें खरबूजा बजट और जनता है और चाकू नेता और पार्टियां हैं। वे बजट पर गिरें या बजट उनके गिरे कटना तो खरबूजा को ही है। क्योंकि नेता को यह भी पसंद नहीं है कि गिरने का हक़ तो केवल और केवल उनका ही है। सरकार कोई भी हो जनता तो खरबूजा ही है।

हमने पूछा कि छेदी बाबू यह बताओ कि आपको यह बजट कैसा लगा। वो बोले हम नेताओं की तरह इंटेलिजेंट तो हैं नहीं जो डेढ़ घंटे लंबे बजट को चंद मिनटों में समझलें। यह इंटेलिजेंशिया नेताओं के पास होती है। इस बुद्धिमत्ता को चट मंगनी पट ब्याह कहते हैं। यह प्रतिभा नेताओं में ही होती है। हम जनता तो 78 साल बाद ही यह नहीं जान पाए कि नेता की नीयत अच्छी है या बुरी।

वे बोले नेताओं की जेहन में किसी भी विषय पर एक्सपर्ट टिप्पणी इंस्टेंट होती है, जो पटाक से जुबान पर आ जाती है। बेकार बजट है, आम आदमी विरोधी है। गरीब और महिलाओं खेत खलिहान के लिए इसमें कुछ नहीं है। शिक्षा स्वास्थ्य की अनदेखी की गई है। खगोल साइंस, टेक्नोलॉजी अधोसंरचना, रेल और युवा की अपेक्षा की गई है। कुल मिलाकर यह डब्बा है खाली डब्बा। इसे न गरीब, किसान और श्रमिक की समझ से दूर है। यह झूठ का पुलिंदा है। बस हो गया बजट का क्रियाकर्म। नेताओं को याद दिला दें कि वे गर्भस्थ शिशुओं के पक्ष में भी बोलें । ये पक्ष उनसे छूट रहा है।

सब से समझदार नेता प्रतिपक्ष निकले उन्होंने कहा कि बजट पर टिप्पणी कल (सोच समझ कर )करेंगे। सही बात है सोच समझ कर बोलना चाहिए। लेकिन उनसे इंटेलिजेंट तो अध्यक्ष जी ने निकले उन्होंने तत्काल कहा बेकार बजट है।किंतु प्रतिपक्ष के नेता चंद मिनटों में ही ज्ञान प्राप्त हो गया। उन्होंने लिखा, 'युवा बिना नौकरी के। मैन्युफैक्चरिंग में गिरावट। निवेशक पैसे निकाल रहे हैं। घरेलू बचत में भारी गिरावट हो रही है। किसान संकट में हैं। वैश्विक संकट को नज़र अंदाज किया गया है। हो सकता है कि वे किसी बोधि वृक्ष के नीचे जा बैठे हों। 

सही प्रतिक्रियाएं तो अब सदन में देखने सुनने को मिलेगी जब वहां नारे गूंजेंगे, प्लेकार्ड लहराएंगे, कागजों के प्लेन उड़ेंगे, टेबल्स पर डांस होंगे। तब जा कर लोकतंत्र और संविधान निहाल होगा । आइए हम सब जय घोष करें संविधान अमर रहे, लोकतंत्र अमर रहे।


 ( लेखक व्यंग्यकार एवं एक राजनैतिक समीक्षक भी हैं। )

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