तमिलनाडु में अगले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं। सत्ताधारी दल डीएमके को चुनौती देने के लिए भाजपा ने एआईएडीएमके के साथ-साथ छोटी तमिल पार्टियों से भी हाथ मिलाया है। ऐसे में एक बार फिर भाजपा- एआईएडीएमके गठबंधन की चर्चा हो रही है।
भाजपा ने AIADMK के साथ औपचारिक रूप से गठबंधन कर लिया है, जिसका नेतृत्व अब पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी महासचिव एडप्पादी के पलानीस्वामी (EPS) कर रहे हैं। मकसद साफ है, मुख्यमंत्री एम के स्टालिन के नेतृत्व वाली मौजूदा डीएमके सरकार को हटाने के लिए एक मजबूत मोर्चा बनाना।
एआईएडीएमके के साथ भाजपा का हुआ बार-बार ब्रेक अप
एक समय की बात है, जयललिता के नेतृत्व वाली AIADMK ने केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की कमजोर सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। 1999 में समर्थन वापस लेने से अविश्वास प्रस्ताव के बाद एनडीए सरकार गिर गई, जिससे बीच में ही लोकसभा चुनाव करवाने पड़े।
भाजपा के लिए यह सिर्फ एक राजनीतिक झटका नहीं था, बल्कि गठबंधन की राजनीति की कमजोरी का एक कड़ा सबक था। 1999 की इस घटना को धोखा माना जा सकता है और फिर भी लगभग तीन दशक बाद इतिहास खुद को दोहराता हुआ दिख रहा है। बार-बार ब्रेकअप के बावजूद राजनीतिक मजबूरियों की वजह से दोनों पार्टियां एक-दूसरे के पास वापस आती रहीं।
भाजपा और AIADMK के रिश्तों का पैटर्न
हालांकि भाजपा और AIADMK के बीच गठबंधन का एक लंबा इतिहास रहा है, लेकिन यह रिश्ता शायद ही कभी सहज रहा हो। यह रिश्ता कई बार अचानक टूटा है। सबसे बड़ा टकराव 1999 में हुआ, जब जयललिता ने वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सरकार सिर्फ एक वोट से गिर गई।
फिर भी, कुछ ही सालों बाद दोनों पार्टियां फिर से साथ आ गईं। तब से यह सिलसिला कई बार दोहराया गया है। सबसे हाल ही में 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, जब वे अलग-अलग लड़े और फिर 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले उसी बातचीत की मेज पर वापस आ गए। इसलिए, भाजपा-एआईएडीएमके संबंधों की कहानी विचारधारा से ज्यादा गणित के बारे में है। एक ऐसा रिश्ता जो जरूरत से चलता है।
दोनों पार्टियों के रिश्तों की टाइमलाइन
1998-99
पहला गठबंधन 1998 के लोकसभा चुनावों में हुआ। भाजपा के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ किया। हालांकि यह गठबंधन ज्यादा दिनों तक नहीं चला। एक साल के अंदर ही जयललिता ने एनडीए से अपना समर्थन वापस ले लिया और वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई।
यह दरार जयललिता के खिलाफ कई भ्रष्टाचार के मामलों और डीएमके के साथ तनावपूर्ण रिश्तों की वजह से आई। फिर द्रविड़ नेता एम करुणानिधि के नेतृत्व वाली डीएमके ने वाजपेयी सरकार को समर्थन देने के लिए कदम बढ़ाया।
2004 में फिर आए साथ
2004 के लोकसभा चुनावों से कुछ महीने पहले डीएमके ने भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए से संबंध तोड़ लिए। इसके बाद भगवा पार्टी एक बार फिर जयललिता के नेतृत्व वाली एआईएडीएमके के पास गई और तमिलनाडु में एक नया गठबंधन बनाया। हालांकि, इस प्रयोग से चुनावी तौर पर कोई फायदा नहीं हुआ और भाजपा राज्य में एक भी सीट नहीं जीत पाई। वहीं, केंद्र की सत्ता से भी दूर रही।
2016-2019: अम्मा के बाद का दौर
2016 के आखिर में अनुभवी राजनेता और AIADMK सुप्रीमो जे जयललिता की मौत के बाद दशकों तक तमिलनाडु पर राज करने वाली पार्टी में जबरदस्त गुटबाजी देखी गई। सत्ता के लिए लड़ाई शुरू हो गई, जिसमें शशिकला परिवार, ओ पन्नीरसेल्वम और एडप्पादी के पलानीस्वामी सहित अम्मा के कई दावेदार सामने आए। आखिरकार पलानीस्वामी ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली और अब पार्टी के प्रमुख हैं।
इस दौरान AIADMK ने केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को नीतियों के आधार पर समर्थन देना शुरू कर दिया। हालांकि औपचारिक गठबंधन का एलान नहीं किया गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन हुआ लेकिन यह प्रयोग बुरी तरह फेल रहा। AIADMK-BJP गठबंधन तमिलनाडु और पुडुचेरी में 40 लोकसभा सीटों में से 39 हार गया।
2021-2023: साथ आए, फिर अलग हुए
2019 की हार के बावजूद AIADMK-BJP गठबंधन 2021 के विधानसभा चुनावों तक जारी रहा। नतीजा एक और हार थी। AIADMK ने सिर्फ 66 सीटें जीतीं, भाजपा को चार सीटें मिलीं और डीएमके-कांग्रेस गठबंधन स्टालिन के नेतृत्व में सत्ता में वापस आ गया।
इसके बाद 2022 तक भाजपा ने अकेले स्थानीय निकाय चुनाव लड़े। 2023 में भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई द्वारा जयललिता पर विवादास्पद टिप्पणी करने के बाद रिश्ते फिर से टूट गए।
2026 में फिर से वापसी
दो साल बाद भाजपा और एआईएडीएमके 2025 में औपचारिक रूप से फिर से एक साथ आए और घोषणा की कि एनडीए आने वाले विधानसभा चुनाव EPS (पलानीस्वामी) के नेतृत्व में लड़ेगा।

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