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झाबुआ की माटी का उत्सव: भगोरिया मेला — परंपरा, प्रेम और पहचान का अनूठा संगमCelebrating the soil of Jhabua: Bhagoria Fair – a unique confluence of tradition, love and identity

 अजय कुमार बियानी

मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचल में जब होली से पहले रंगों की आहट सुनाई देने लगती है, तब झाबुआ और अलीराजपुर की धरती एक विशेष उल्लास से भर उठती है। यह उल्लास है भगोरिया मेले का—एक ऐसा लोक उत्सव जो केवल व्यापारिक हाट नहीं, बल्कि आदिवासी जीवन दर्शन, प्रेम, सामाजिक स्वीकृति और सांस्कृतिक गौरव का जीवंत प्रतीक है। समय के साथ बहुत कुछ बदला है, पर भगोरिया आज भी अपनी मूल आत्मा में उतना ही सजीव और स्पंदित है।


भगोरिया मेला भील, भिलाला और पटलिया जनजातियों की सांस्कृतिक धड़कन माना जाता है। यह उत्सव होली से लगभग एक सप्ताह पूर्व विभिन्न कस्बों और गांवों में क्रमवार आयोजित होता है। इन दिनों पूरा अंचल मानो रंग, संगीत और उत्साह के समुद्र में डूब जाता है। पारंपरिक वेशभूषा, चांदी के आभूषणों की खनक, मांदल की थाप और बांसुरी की मधुर तान—सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं जो लोक संस्कृति की जीवंत पाठशाला बन जाता है।

इतिहासकारों और लोक परंपराओं के जानकारों के अनुसार भगोरिया मेले की परंपरा का संबंध राजा भोज के काल से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि भील शासकों कासुमरा और बालून ने अपने समय में इस हाट की शुरुआत की थी, जो आगे चलकर एक विशाल सांस्कृतिक उत्सव का रूप लेती गई। कृषि चक्र की दृष्टि से देखें तो यह रबी की फसल पकने की खुशी का भी पर्व है—प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और नए उत्सव चक्र के स्वागत का अवसर।

भगोरिया की सबसे चर्चित विशेषता इसका पारंपरिक ‘स्वयंवर’ स्वरूप रहा है। लोकमान्यता के अनुसार, मेले में युवक द्वारा युवती को गुलाल लगाना और युवती द्वारा उसे स्वीकार करना आपसी सहमति का संकेत माना जाता था। यद्यपि आधुनिक समय में इस परंपरा के स्वरूप में परिवर्तन आया है और सामाजिक जागरूकता बढ़ी है, फिर भी यह पहलू भगोरिया को विशिष्ट पहचान देता है। इसी प्रकार ‘पान का बीड़ा’ देने की परंपरा भी सामाजिक संवाद का प्रतीक रही है।

मेले का दृश्य किसी जीवंत चित्रकला से कम नहीं होता। दूर-दूर से आए लोग पारंपरिक परिधानों में सजे दिखाई देते हैं। महिलाएं भारी चांदी के आभूषणों से अलंकृत, और पुरुष रंग-बिरंगे साफों में—जब मांदल की लय पर थिरकते हैं, तो पूरा वातावरण उल्लास से भर उठता है। झूले, खिलौनों की दुकानें, हार-कंगन के ठेले, स्थानीय व्यंजन और ताड़ी की महक—ये सब मिलकर भगोरिया को एक पूर्ण लोक उत्सव बना देते हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि भगोरिया किसी एक स्थान या एक दिन का आयोजन नहीं है। यह सात दिनों तक चलने वाली हाटों की श्रृंखला है, जो झाबुआ, थांदला, पेटलावद, रानापुर सहित कई कस्बों में क्रमवार लगती है। हर हाट की अपनी अलग पहचान और रंगत होती है। कहीं ढोल-मांदल की गूंज प्रमुख होती है, तो कहीं गेर नृत्य की टोलियां आकर्षण का केंद्र बनती हैं। इन सात दिनों में आदिवासी समाज अपने आपसी मतभेद भुलाकर सामूहिक आनंद में डूब जाता है—यही इसकी सामाजिक शक्ति है।

आज भगोरिया मेला स्थानीय सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है। देश-विदेश से पर्यटक इस अद्भुत लोक उत्सव को देखने पहुंचते हैं। उनके लिए यह केवल एक मेला नहीं, बल्कि भारत की जीवित जनजातीय संस्कृति से साक्षात्कार का अवसर होता है। पर्यटन की दृष्टि से यह क्षेत्र के आर्थिक विकास का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।

हालांकि बढ़ती लोकप्रियता के साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। बाजारीकरण, अत्यधिक भीड़, और आधुनिकता के प्रभाव से मूल लोक स्वरूप पर दबाव पड़ने की आशंका बनी रहती है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन, समाज और सांस्कृतिक संस्थाएं मिलकर भगोरिया की आत्मा को सुरक्षित रखें। पर्यटन को बढ़ावा मिले, लेकिन परंपरा की गरिमा अक्षुण्ण रहे—यही संतुलन समय की मांग है।

भगोरिया मेला हमें यह भी सिखाता है कि भारत की असली शक्ति उसकी विविधता और लोक परंपराओं में निहित है। यह उत्सव प्रेम को सामाजिक स्वीकृति देता है, प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करता है और सामुदायिक एकता का संदेश देता है। आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में जब समाज अक्सर कृत्रिमता की ओर बढ़ रहा है, तब भगोरिया जैसी परंपराएं हमें हमारी जड़ों से जोड़ने का काम करती हैं।

आज जरूरत है कि नई पीढ़ी केवल दर्शक बनकर न रहे, बल्कि इस सांस्कृतिक धरोहर को समझे, सहेजे और आगे बढ़ाए। यदि हमने अपनी लोक परंपराओं की रक्षा की, तो यही उत्सव आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी माटी से जोड़े रखेंगे।

भगोरिया केवल एक मेला नहीं—यह झाबुआ की माटी की महक, आदिवासी अस्मिता का उत्सव और भारत की सांस्कृतिक आत्मा का रंगीन प्रतिबिंब है।

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