आजकल स्किनकेयर को लेकर जागरूकता बढ़ी है और सनस्क्रीन हर किसी के ब्यूटी रूटीन का अनिवार्य हिस्सा बन गया है। हालांकि, अधिकांश लोग इस गलतफहमी का शिकार हैं कि सनस्क्रीन लगाने के बाद त्वचा बिल्कुल टैन (Tanning) नहीं होगी। स्किनकेयर एक्सपर्ट डॉ. श्रेया सांखे ने इस प्रचलित मिथक को तोड़ते हुए भारतीय त्वचा पर सनस्क्रीन के वास्तविक प्रभाव को स्पष्ट किया है।
सनस्क्रीन और टैनिंग का विज्ञान
डॉ. श्रेया के अनुसार, सनस्क्रीन का काम स्किन की सुरक्षा करना है, न कि टैनिंग को पूरी तरह रोकना। जब हम धूप में बाहर निकलते हैं, तैरते हैं या पैदल चलते हैं, तो पसीने, पानी और धूल-मिट्टी के कारण सनस्क्रीन की परत कमजोर पड़ने लगती है। खासकर सांवली या गहरे भूरे रंग की स्किन में मेलेनिन एक्टिव होता है, जिससे टैनिंग होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। सनस्क्रीन लगाने का मतलब यह नहीं है कि आपकी त्वचा का प्राकृतिक मेलेनिन प्रोडक्शन रुक जाएगा।
सोशल मीडिया के दावों से रहें सावधान
अक्सर इन्फ्लुएंसर्स यह दावा करते हैं कि सनस्क्रीन के उपयोग से उन्हें जरा भी टैनिंग नहीं हुई। डॉ. सांखे इसके पीछे दो कारण बताती हैं। उनका कहना है कि गोरी त्वचा पर टैनिंग उतनी स्पष्ट नहीं दिखती जितनी सांवली त्वचा पर।
उन्होंने यह भी बताया कि कई बार 'नो टैन' का दावा सिर्फ प्रोडक्ट बेचने का एक जरिया होता है, जो पूरी तरह सच नहीं है।
सनस्क्रीन के असली फायदे
सनबर्न और स्किन कैंसर के खतरे से बचाव।
त्वचा के बैरियर को सुरक्षित रखना।
पिगमेंटेशन और झुर्रियों को कम करना।
विशेषज्ञ की सलाह- टैनिंग के डर से धूप में निकलना न छोड़ें। सुरक्षा के लिए सनस्क्रीन को हर 2-3 घंटे में दोबारा लगाएं, शरीर को कपड़ों से ढकें और त्वचा को हाइड्रेटेड रखें। याद रखें, सनस्क्रीन आपकी त्वचा की सुरक्षा के लिए है, रंग गोरा रखने के लिए नहीं।

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