सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को आवारा कुत्तों के प्रबंधन को लेकर राज्यों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि आवारा कुत्तों के लिए आश्रय केंद्र बनाने, टीकाकरण व नसबंदी की क्षमता बढ़ाने और अस्पताल, स्कूल, बस अड्डे जैसे संस्थागत क्षेत्रों से कुत्तों को हटाने संबंधी आदेशों का पूरा पालन नहीं किया गया है। इसके साथ ही राज्यों द्वारा दाखिल हलफनामों में भी स्पष्ट जानकारी का अभाव है।
सामान्य बयानबाजी स्वीकार नहीं की जाएगी
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने राज्यों के हलफनामों को लेकर असंतोष जताते हुए चेतावनी दी कि अस्पष्ट और सामान्य बयानबाजी स्वीकार नहीं की जाएगी। पीठ ने कहा कि राज्यों के जवाब तथ्यात्मक नहीं हैं और वे हवा-हवाई दावे कर रहे हैं।
सुनवाई के दौरान न्यायमित्र गौरव अग्रवाल ने राज्यों की ओर से दाखिल अनुपालन हलफनामों का विश्लेषण करते हुए कई खामियां गिनाईं। उन्होंने कहा कि कुछ कदम जरूर उठाए गए हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। उनके मुताबिक, पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) सुविधाओं का विस्तार, आवारा कुत्तों की नसबंदी की रफ्तार बढ़ाना, आश्रय स्थल स्थापित करना और संस्थागत क्षेत्रों की बाड़बंदी बेहद जरूरी है। साथ ही राजमार्गों से भी आवारा पशुओं को हटाना होगा।
बिहार का उदाहरण देते हुए अग्रवाल ने बताया कि राज्य में 34 एबीसी केंद्र हैं, जहां 20,648 कुत्तों की नसबंदी की गई है, लेकिन यह साफ नहीं किया गया कि रोजाना कितने कुत्तों की नसबंदी की क्षमता है। उन्होंने यह भी कहा कि एबीसी केंद्रों का समुचित ऑडिट नहीं किया गया और यह जानकारी भी नहीं दी गई कि संस्थागत परिसरों में बाड़बंदी को लेकर कितने स्थानों का सर्वे हुआ।
इस पर बिहार सरकार की ओर से पेश वकील मनीष कुमार ने कहा कि राज्य इस दिशा में काम कर रहा है और तीन महीने में उल्लेखनीय प्रगति होगी। हालांकि कोर्ट ने इस दलील पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे सामान्य आश्वासन स्वीकार्य नहीं हैं।
काटने की घटनाओं का पूरा ब्योरा नहीं दिया
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि असम को छोड़कर किसी भी राज्य ने कुत्तों के काटने की घटनाओं का पूरा ब्योरा नहीं दिया। असम द्वारा दिए गए आंकड़ों पर कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि वर्ष 2024 में 1.66 लाख और 2025 में सिर्फ जनवरी महीने में ही 20,900 काटने की घटनाएं दर्ज हुई हैं, जो बेहद चिंताजनक हैं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकारें हलफनामों में अस्पष्ट बातें नहीं लिख सकतीं और ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। सुनवाई के दौरान गोवा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, दिल्ली, झारखंड और गुजरात की दलीलें भी सुनी गईं, जिनमें संस्थागत परिसरों की बाड़बंदी के आदेशों के पालन में कमी पाई गई।
हर सार्वजनिक भवन की बाड़बंदी जरूरी
कोर्ट ने कहा कि हर सार्वजनिक भवन की बाड़बंदी जरूरी है, न केवल आवारा कुत्तों और पशुओं से बचाव के लिए, बल्कि संपत्ति की सुरक्षा के लिहाज से भी। न्यायमित्र अग्रवाल ने बताया कि गुरुवार को पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना द्वारा उठाए गए कदमों पर चर्चा की जाएगी।

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