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. बंगाल में राष्ट्रपति शासन के आसार President's rule is likely in West Bengal.

    • रवि उपाध्याय 

ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल में इन दिनों जो हालात हैं वो अत्यंत ही चिंता जनक हैं। वहां कानून व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई लगती है। हिंसा का बोलबाला है। वहां का पुलिस प्रशासन कानून के अनुसार नहीं बल्कि सत्तारूढ़ दल के इशारे पर पूरी तरह कार्यवाही करता नजर आता है। पश्चिम बंगाल को इस अराजकता से बचाने के लिए वहां राष्ट्रपति शासन ही एक मात्र विकल्प नज़र आता है। चुनाव तो आते जाते रहेंगे पहले पश्चिम बंगाल को सरहदी राज्य होने के नाते बचाया जाना जरूरी है। आज के हालात में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी का स्मरण आता है। उनके समय में पश्चिम बंगाल में ऐसी अस्थिरता बनती तो वे वहां कभी का राष्ट्रपति शासन लगा चुकी होतीं। यहां उल्टा नजर आता है पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री सख्त है और केंद्र सरकार सुस्त।


गुरुवार को कोलकाता में मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने जिस तरह संवैधानिक संस्था प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के जांच अधिकारियों से जांच के दस्तावेज छीन कर अपने साथ ले जाने का काम किया है वह अभूतपूर्व है। इस तरह कदम की अपेक्षा मुख्यमंत्री जैसे उच्च संवैधानिक पद पर बैठी राज्य की मुखिया से नहीं की जा सकती है। बता दें कि जिस समय यह घटना घटी उस समय गुरुवार का ईडी की टीम साल्ट लेक इलाके में स्थित आई- पैक के दफ्तर में कोयला तस्करी में हवाला के जरिए धन शोधन की जांच कर रही थी। जांच की भनक लगते ही ममता बनर्जी अपने साथ कोलकाता के पुलिस कमिश्नर और डीजीपी (पुलिस महा निदेशक) सहित अन्य अधिकारियों के साथ घटना स्थल पर जा धमकी और वहां से वे बलात दस्तावेज अपने साथ लेकर चली गईं । जिनकी जांच ईडी अधिकारी कर रहे थे। यह घटनाएं हमारी संविधान तथा संघीय व्यवस्था को एक गंभीर चुनौती है। 

बंगाल में पुलिस पूरी तरह से मुख्य मंत्री और बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी की बंधक बन कर रह गई है। वहां टीएमसी के कार्यकर्ताओं के खिलाफ किसी भी आपराधिक घटना के खिलाफ पुलिस थानों में रिपोर्ट नहीं लिखवाई जा सकती है। करीब डेढ़ दशक पहले यही स्थितियां तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकारों के समय थी। सीपीएम की सल्तनत के खात्मे के बाद सीपीएम के समर्थक आज टीएमसी में शामिल हैं।

इससे भी गंभीर घटना कोलकाता के हाईकोर्ट में 09 जनवरी को उस समय कोर्ट रूम में घटी जब गुरुवार को ममता बनर्जी और ईडी द्वारा एक दूसरे के विरुद्ध दायर याचिका पर सुनवाई चल रही थी। उस दौरान टीएमसी के सैकड़ों कार्यकर्ता और नेता कोर्ट रूम में जबरन घुस कर हंगामा करने लगे। ऐसी स्थिति में न्यायमूर्ति ने याचिका पर सुनवाई 14 जनवरी 2026 के लिए मुल्तवी कर दी। इसी बीच ईडी याचना ले कर सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गई है। हाई कोर्ट को बंधक बनाने की यह एक गंभीर घटना है। इसे नज़र अंदाज नहीं किया जाना चाहिए। वरना आगे चल कर यह नासूर बन जाएंगी।

           अराजकता का माहौल 

उपरोक्त घटनाओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। वहां सरकार के संरक्षण में अराजकता व्याप्त है। पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह खत्म हो चुकी है। अतीत में 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव के समय और उसके बाद भड़की हिंसा, वोटर्स पर हमलों के बाद उनके पलायन की घटनाएं भी हमारे सामने हैं। आरजीके मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर के साथ बलात्कार की घटना केवल एक अकेली घटना नहीं है। महिलाओं के साथ बलात्कार की ऐसी कई घटनाएं घट चुकीं हैं।

           राज्यपाल को धमकी 

गुरुवार को आई पैक के ऑफिस में ईडी के साथ हुई घटना के बाद मुख्य मंत्री बनर्जी ने सैकड़ों टीएमसी कार्यकर्ताओं के साथ ईडी और केंद्र सरकार के खिलाफ कोलकाता में एक बड़ी रैली निकाली । इसी से उत्साहित हो कर किसी अज्ञात व्यक्ति ने वहां के गवर्नर सीवी आनंद को ई मेल भेज कर बम से उड़ा देने की धमकी भेजी। इसकी जांच पुलिस कर रही है। गवर्नर गुरुवार को आई पैक के दफ्तर सह कंपनी के मालिक प्रदीप जैन के निवास पर छापे के बाद स्थिति का जायजा लेने सड़क पर निकले थे। 

            केंद्र सरकार असफल 

पिछले सालों की घटनाओं को देखा जाए तो हम पाते हैं कि केंद्र सरकार की भूमिका शतुरमुर्ग की तरह रही है। केंद्र का इक़बाल गायब नजर आता है। पश्चिम बंगाल की स्थित 2019 के बाद से जिस तरह से अराजक बनी है वह केंद्र की अक्षमता को प्रदर्शित करती है। देश की सुरक्षा में मोदी सरकार को दस में से दस नम्बर दिए जा सकते हैं पर आंतरिक सुरक्षा उतनी संतोष जनक नहीं है जिस की अपेक्षा है। इस मामले में सख्त कदम की जरूरत है। मोदी सरकार चुनाव की राजनीति से ऊपर उठ कर देश की अखंडता की चिंता करे। भाषण नहीं ठोस कदम उठाए। गुडी गुडी बनने से काम नहीं चलेगा। उसे राष्ट्र धर्म और उस राज दंड की मंशा के अनुसार करना चाहिए जिस राजदंड को उसने लोकसभा में सजा रखा है। 

 राष्ट्रपति शासन मांग रहा प. बंगाल 

पश्चिम बंगाल की मौजूदा कानून व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए। इसका उदाहरण है एसआईआर को लेकर खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का व्यवहार। वहां एसआईआर की कार्रवाई के दौरान उक्त काम में लगे कर्मचारियों को धमकाया गया। टीएमसी कार्यकर्ताओं को कहा गया कि सर्वे का विरोध करें। यदि किसी का नाम काटा जाए तो उसका कड़ा विरोध करें। मुख्यमंत्री ने राज्य में एसआईआर का खुल्लम खुल्ला विरोध कर बीएलओ द्वारा कथित आत्म हत्या का उठा कर प्रक्रिया रोकने की मांग की। उन्होंने अपरोक्ष रूप से पड़ोसी देश से आए घुसपैठियों का पक्ष लिया।

इन घटनाओं से यह साबित होता है कि प. बंगाल में मौजूदा सरकार के आधीन वहां निष्पक्ष चुनाव नहीं करवाए जा सकते हैं। वहां राष्ट्रपति शासन लगा कर विधानसभा चुनावों को एक साल के लिए स्थगित कर नए ढंग से एसआईआर कराना चाहिए। उसके बाद ही वहां निष्पक्ष चुनाव संभव हो सकेंगे। 



( लेखक राजनैतिक समीक्षक और एक व्यंग्यकार हैं। )

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