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ईरान संकट: बयानबाज़ी से बमबारी तक की दूरी कितनी?Iran crisis: How far is it from rhetoric to bombing?

 


[मध्य पूर्व दहलीज़ पर: शब्दों से हथियारों तक?]

[‘नई लीडरशिप’ से ‘ऑल-आउट वॉर’ तक बढ़ता टकराव]

·       आरके जैन “अरिजीत”

मध्य पूर्व एक बार फिर सत्ता और संघर्ष की दहलीज़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक तीखे और असाधारण बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में खलबली मचा दी है, जिसमें उन्होंने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के दशकों पुराने शासन को विफल बताते हुए “नई लीडरशिप” की खुली मांग कर डाली। यह केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की ओर इशारा करता हुआ सशक्त संकेत माना जा रहा है। यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब ईरान भीतर ही भीतर आर्थिक दबाव, सामाजिक असंतोष और जनआक्रोश से जूझ रहा है। ऐसे में सवाल और तीखा हो उठता है—क्या यह महज़ शब्दों की जंग है, या किसी बड़े टकराव की प्रस्तावना?


ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों की जड़ें बेहद गहरी और पीड़ादायक हैं। ईंधन सब्सिडी में कटौती से भड़का जनआक्रोश अब बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, राजनीतिक दमन और व्यापक गरीबी के खिलाफ जनांदोलन का रूप ले चुका है। सरकारी आंकड़ों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक, इन प्रदर्शनों में अब तक हजारों लोग जान गंवा चुके हैं। सड़कों पर उतरे युवा, महिलाएं और मजदूर सीधे तौर पर शासन को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। ऐसे माहौल में ट्रंप का यह कहना कि ईरान को नई नेतृत्व व्यवस्था की जरूरत है, प्रदर्शनकारियों के लिए नैतिक समर्थन जैसा लगा, जबकि सत्ता के लिए यह एक सीधी चुनौती बन गया।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने बयान में खामेनेई को न सिर्फ ईरान की बर्बादी का जिम्मेदार ठहराया, बल्कि उन्हें “सिक मैन” कहकर व्यक्तिगत हमला भी किया। उनका कहना था कि जिस सत्ता की नींव डर और हिंसा पर टिकी हो, वह देश को सम्मान और समृद्धि नहीं दे सकती। ट्रंप का यह रुख नया नहीं है। 2018 में ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकलने के बाद से उन्होंने ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति अपनाई है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह दबाव बयानबाजी से आगे बढ़कर खुले तौर पर सत्ता परिवर्तन की मांग में बदलता दिख रहा है।

ईरानी नेतृत्व की प्रतिक्रिया भी उतनी ही कठोर और आक्रामक रही। सुप्रीम लीडर खामेनेई ने ट्रंप को “अपराधी” और “राजद्रोह भड़काने वाला” बताया, जबकि राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने साफ चेतावनी दी कि खामेनेई पर किसी भी तरह का हमला पूरे ईरानी राष्ट्र के खिलाफ 'फुल-स्केल वॉर' या 'ऑल-आउट वॉर' माना जाएगा। यह बयान केवल कूटनीतिक भाषा नहीं, बल्कि युद्ध की सीधी धमकी है। इससे साफ हो गया कि ईरान इस मामले को सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं, बल्कि अपनी संप्रभुता पर खुला आघात मान रहा है।

इस टकराव की गूंज सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहने वाली। मध्य पूर्व पहले ही संघर्षों की आग में सुलग रहा है—गाजा, यमन, सीरिया और लेबनान के हालात जगजाहिर हैं। यदि अमेरिका और ईरान आमने-सामने आते हैं, तो इसका असर तेल आपूर्ति, वैश्विक बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ेगा। इजराइल और सऊदी अरब जैसे अमेरिकी सहयोगी ट्रंप के रुख से उत्साहित दिखते हैं, जबकि रूस और चीन खुलकर ईरान के पक्ष में खड़े हैं। यह टकराव वैश्विक शक्ति संतुलन को भी गंभीर चुनौती दे सकता है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि अमेरिका की “रेजीम चेंज” नीति हमेशा स्थिरता नहीं लाती। इराक और लीबिया इसके ठोस उदाहरण हैं, जहां सत्ता परिवर्तन के बाद अराजकता और हिंसा बढ़ी। ईरान की स्थिति और भी जटिल है, क्योंकि वहां सत्ता धार्मिक, सैन्य और राजनीतिक संस्थाओं के मजबूत गठबंधन पर टिकी है। ट्रंप की बयानबाज़ी से अल्पकालिक दबाव जरूर बनता है, लेकिन इससे ईरानी राष्ट्रवाद भी और मजबूत हो सकता है। विदेशी हस्तक्षेप का खतरा अक्सर आंतरिक विरोध को कमजोर करता है—यह सच ईरान पर भी लागू हो सकता है।

ईरान के भीतर हालात बेहद नाज़ुक बने हुए हैं। इंटरनेट ब्लैकआउट, सोशल मीडिया पर सख्त पाबंदियां और कथित विदेशी तकनीकी मदद के आरोप शासन की बेचैनी को उजागर करते हैं। महिलाएं और युवा इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं, जो 2022 के महसा अमीनी आंदोलन की याद दिलाता है, जहाँ हिजाब नियमों के खिलाफ विरोध हुआ था। ट्रंप का बयान इन आंदोलनों को अंतरराष्ट्रीय ध्यान जरूर दिलाता है, लेकिन यह भी सच्चाई है कि अमेरिकी समर्थन की छाया पड़ते ही शासन दमन और तेज कर सकता है। यही विरोधाभास इस पूरे संकट को और अधिक जटिल बना देता है।

वैश्विक स्तर पर प्रतिक्रियाएं साफ तौर पर बंटी हुई नजर आ रही हैं। यूरोपीय देशों ने संयम और संवाद का रास्ता अपनाने की अपील की है, जबकि अमेरिका के भीतर कई नेता ट्रंप के सख्त रुख के समर्थन में खड़े दिखते हैं। सोशल मीडिया पर ईरान में सत्ता परिवर्तन की मांग वाले हैशटैग तेजी से ट्रेंड कर रहे हैं, वहीं अनेक विश्लेषक इसे खतरनाक उकसावे के रूप में देख रहे हैं। मीडिया में यह बहस तेज हो गई है कि क्या ट्रंप वास्तव में सैन्य कार्रवाई की ओर बढ़ना चाहते हैं या फिर यह महज रणनीतिक दबाव बनाने की कोशिश है। ट्रंप का अतीत बताता है कि उनकी धमकियां कई बार बातचीत की मेज तक पहुंचाने का जरिया भी रही हैं।

आखिरकार सवाल यही बचता है कि क्या यह बयान किसी नए युद्ध का संकेत है या राजनीतिक शतरंज का एक सोचा-समझा दांव। फिलहाल दोनों ओर से बयानबाजी तेज है, लेकिन सीधा सैन्य टकराव अभी टलता हुआ नजर आता है। इसके बावजूद “ऑल-आउट वॉर” जैसे शब्द माहौल में तैर रहे हैं, जो किसी भी छोटी चिंगारी को भयानक आग में बदल सकते हैं। यह टकराव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है। आने वाला वक्त तय करेगा कि यह संकट संवाद में ढलेगा या इतिहास एक और युद्ध की पटकथा लिखेगा।

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