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वैश्विक अव्यवस्था में भारतीय विवेक की दस्तक Indian wisdom makes its mark amidst global disorder.

 [ब्रिक्स 2026: एक अध्यक्षता नहीं, एक वैचारिक मोड़]

[विश्व राजनीति में भारत का शांत लेकिन निर्णायक हस्तक्षेप]

 


·       प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

 

नववर्ष 2026 के साथ भारत द्वारा ब्रिक्स की अध्यक्षता ग्रहण किया जाना केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन में एक निर्णायक संकेत है। ऐसे समय में जब विश्व युद्ध, ध्रुवीकरण, आर्थिक अनिश्चितता और संस्थागत अविश्वास के दौर से गुजर रहा है, भारत की यह भूमिका वैश्विक दक्षिण के लिए आशा और दिशा—दोनों का स्रोत बनकर उभरती है। यह अध्यक्षता भारत को न केवल अपनी नेतृत्व क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर देती है, बल्कि वैश्विक विमर्श को अधिक समावेशी, संतुलित और मानव-केंद्रित बनाने की जिम्मेदारी भी सौंपती है।

ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालते हुए भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका दृष्टिकोण प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि दूरदर्शी और समाधान-उन्मुख है। ब्राजील से प्रतीकात्मक गेवेल प्राप्त करने के साथ भारत ने चार मूल स्तंभों—लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता—पर आधारित एजेंडा सामने रखा है। ये स्तंभ वर्तमान वैश्विक संकटों की जड़ों को संबोधित करते हैं। महामारी, युद्ध, आपूर्ति शृंखला बाधाओं और जलवायु आपात स्थितियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिना लचीली प्रणालियों के कोई भी अर्थव्यवस्था सुरक्षित नहीं रह सकती। भारत इसी अनुभव के आधार पर ब्रिक्स को अधिक सक्षम और अनुकूलनशील मंच के रूप में विकसित करना चाहता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “मानवता पहले” की सोच इस पूरी अध्यक्षता की वैचारिक रीढ़ है। यह दृष्टिकोण उस पारंपरिक शक्ति-राजनीति से अलग है जिसमें राष्ट्रों के संबंध केवल हितों और प्रभाव के आधार पर तय होते हैं। विस्तारित ब्रिक्स प्लस के दस सदस्य (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई, इंडोनेशिया) देश भौगोलिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत विविध हैं। ऐसे में भारत की भूमिका एक सेतु-निर्माता की है, जो मतभेदों को टकराव नहीं बल्कि संवाद में बदलने की क्षमता रखता है। वैश्विक दक्षिण की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठाना भारत की प्राथमिकता रहेगी, ताकि विकासशील देशों की चिंताएं केवल सुनी ही नहीं जाएँ, बल्कि नीति निर्माण का आधार भी बनें।

आज की वैश्विक व्यवस्था व्यापार युद्धों, प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से प्रभावित है। ऐसे माहौल में भारत की संतुलित विदेश नीति विशेष महत्व रखती है। एक ओर वह रूस और चीन के साथ ऊर्जा, व्यापार और डिजिटल अवसंरचना में सहयोग को आगे बढ़ाता है, तो दूसरी ओर पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को भी बनाए रखता है। यह बहुस्तरीय कूटनीति भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का प्रमाण है। ब्रिक्स मंच पर इस संतुलन का उपयोग कर भारत यह दिखाना चाहता है कि सहयोग किसी एक ध्रुव के विरोध में नहीं, बल्कि साझा हितों के विस्तार के लिए हो सकता है।

एनडीबी (न्यू डेवलपमेंट बैंक) की भूमिका इस संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, परिवहन और सामाजिक विकास से जुड़ी परियोजनाओं में निवेश बढ़ाकर यह बैंक विकासशील देशों को वैकल्पिक वित्तीय सहारा प्रदान करता है। भारत की अध्यक्षता में बैंक को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और परिणामोन्मुख बनाने पर जोर दिया जाएगा। इससे रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को दीर्घकालिक स्थिरता प्राप्त होगी। यह प्रयास वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में संतुलन लाने की दिशा में एक ठोस कदम माना जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन आज केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि यह विकास, सुरक्षा और सामाजिक न्याय से जुड़ा केंद्रीय मुद्दा बन चुका है। भारत अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान हरित वित्त, स्वच्छ ऊर्जा और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को प्राथमिकता देगा। पेरिस समझौते की प्रतिबद्धताओं को समय से पहले पूरा करने की दिशा में भारत की प्रगति उसे नैतिक बढ़त प्रदान करती है। यही कारण है कि भारत जलवायु न्याय की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए यह तर्क देता है कि ऐतिहासिक रूप से कम उत्सर्जन करने वाले देशों पर असमान दायित्व नहीं डाला जाना चाहिए। ब्रिक्स मंच इस विमर्श को संस्थागत स्वर देने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

तेजी से विकसित हो रही कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीकों के संदर्भ में भारत एक संतुलित और नैतिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। तकनीक का लाभ सीमित देशों या कॉरपोरेट समूहों तक सिमटने के बजाय समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, यह भारत की सोच का मूल है। ब्रिक्स के भीतर एआई सहयोग, कौशल विकास और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के साझा मॉडल को प्रोत्साहित किया जाएगा। साथ ही ब्रिक्स वैक्सीन अनुसंधान एवं विकास केंद्र को सुदृढ़ कर भविष्य की महामारियों के प्रति सामूहिक तैयारी सुनिश्चित करने पर बल दिया जाएगा। “वन अर्थ, वन हेल्थ” का विचार इसी व्यापक मानवतावादी दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करता है।

स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने का भारत का दृष्टिकोण व्यावहारिक और संतुलित है। इसका उद्देश्य किसी एक मुद्रा के वर्चस्व को चुनौती देना नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार को अधिक लचीला और सुरक्षित बनाना है। भारत यह स्पष्ट करता है कि डी-डॉलराइजेशन कोई वैचारिक अभियान नहीं, बल्कि विकल्पों के विस्तार की प्रक्रिया है। इसके साथ ही आईएमएफ और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर भी बल दिया जाएगा, ताकि विकासशील देशों को निर्णय प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व मिल सके और वैश्विक शासन अधिक लोकतांत्रिक बन सके।

लोगों से लोगों के संपर्क को सशक्त बनाना भारत की अध्यक्षता का मानवीय पक्ष है। सांस्कृतिक आदान-प्रदान, युवा कार्यक्रम, शैक्षणिक सहयोग, स्टार्टअप नेटवर्क और पर्यटन को बढ़ावा देकर ब्रिक्स को केवल आर्थिक समूह नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक मंच के रूप में विकसित किया जाएगा। नए सदस्य देशों के समुचित एकीकरण के लिए संस्थागत सुधार आवश्यक होंगे, ताकि निर्णय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, प्रभावी और सर्वसम्मति आधारित बन सके। इससे ब्रिक्स की आंतरिक एकता और वैश्विक विश्वसनीयता दोनों मजबूत होंगी।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता 2026 बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह अध्यक्षता यह संदेश देती है कि वैश्विक नेतृत्व का अर्थ प्रभुत्व नहीं, बल्कि साझेदारी, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व है। सहयोग, नवाचार और सतत विकास के मूल्यों पर आधारित यह दृष्टिकोण वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को नई आवाज देता है। भारत एक ऐसे जिम्मेदार और दूरदर्शी नेता के रूप में उभरता है, जो न केवल वर्तमान चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करता है, बल्कि भविष्य की अधिक न्यायपूर्ण, संतुलित और मानव-केंद्रित विश्व व्यवस्था की नींव भी रखता है।

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