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परंपरा की जड़ों से ऊर्जा लेकर भविष्य की ओर बढ़ता भारत India, drawing energy from the roots of its traditions, moves towards the future.

[चुनौतियों को साधता नेतृत्व: वैश्विक अनिश्चितता में मोदी मॉडल]

 


·      प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


तूफानों से भागने वाले समय की धूल में खो जाते हैं, लेकिन जो तूफान को साध लेते हैं वही युग गढ़ते हैं। नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली इसी साहसिक दर्शन से जन्म लेती है, जहां ऊर्जा केवल गति नहीं, बल्कि दिशा बन जाती है। वैश्विक अस्थिरता, व्यापारिक दबाव और बदलती कूटनीति के बीच उनका नेतृत्व विचलित नहीं होता। वे हालात से संचालित नहीं, बल्कि हालात को गढ़ने वाले नेता हैं। हर चुनौती उनके लिए रुकावट नहीं, संभावना का द्वार है। यही कारण है कि उनका हर निर्णय तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सोच का विस्तार प्रतीत होता है, जिसमें भारत केवल सहभागी नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरता दिखाई देता है।

ट्रंप की टैरिफ धमकियों के बीच, अहमदाबाद की धरती पर जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ के साथ हुआ संवाद साधारण औपचारिकता नहीं, बल्कि भविष्य की साझेदारी का स्पष्ट संकेत था। वैश्विक शुल्क तनाव और आर्थिक अनिश्चितताओं के दौर में भारत जर्मनी संबंधों को असीम क्षितिज देना मोदी की रणनीतिक दृष्टि को दर्शाता है। शिक्षा, रक्षा और हिंद प्रशांत क्षेत्र में सहयोग के प्रस्ताव यह बताते हैं कि भारत अब संबंधों को प्रतीकात्मक नहीं, संरचनात्मक आधार पर गढ़ रहा है। मोदी जानते हैं कि आने वाले समय में केवल मित्र नहीं, बल्कि भरोसेमंद साझेदार ही राष्ट्रों को स्थिरता और शक्ति प्रदान करेंगे।

सोमनाथ में नतमस्तक होकर आरंभ हुआ 2026 का गुजरात प्रवास मोदी की राजनीति का सार प्रस्तुत करता है। यह यात्रा बताती है कि विकास और विरासत परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं। आध्यात्मिक चेतना से जुड़कर आधुनिक भारत की रचना करना उनकी विशिष्ट शैली है। अहमदाबाद मेट्रो और अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव जैसे आयोजन यह दर्शाते हैं कि प्रतीक भी नीति बन सकते हैं। परंपरा को बोझ नहीं, बल्कि शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना मोदी की पहचान है। वे समझते हैं कि जड़ों से जुड़ा राष्ट्र ही वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ खड़ा रह सकता है।

देश के भीतर भी मोदी की कार्यप्रणाली उतनी ही निर्णायक दिखाई देती है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हथियार आधारित सोच से हटकर कल्याण और विकास केंद्रित नीति अपनाना एक ऐतिहासिक मोड़ है। जहां कभी भय और हिंसा का वर्चस्व था, वहां अब विद्यालय, अस्पताल और रोजगार की चर्चा हो रही है। यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मानसिक परिवर्तन भी है, भरोसे की पुनर्स्थापना है। मोदी मानते हैं कि स्थायी शांति बल से नहीं, विश्वास से आती है। विकास को समाधान बनाकर असंतोष की जड़ों पर प्रहार करना उनकी रणनीति का केंद्र है, जो दीर्घकाल में राष्ट्र को आंतरिक रूप से सुदृढ़ बनाता है।

युवा शक्ति को विकसित भारत की धुरी मानना मोदी की सोच का आधार है। वे जेन जेड की रचनात्मकता और नवाचार को केवल सराहते नहीं, बल्कि अवसर भी प्रदान करते हैं। नेतृत्व संवाद, कौशल विकास और प्रेरक अभियानों के माध्यम से युवाओं को नीति निर्माण से जोड़ा जा रहा है। विवेकानंद की चेतना को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करना यह दर्शाता है कि प्रेरणा और शासन के बीच मजबूत सेतु बनाया जा रहा है। हालांकि रोजगार, ग्रामीण असंतोष और जलवायु संकट जैसे प्रश्न गंभीर बने हुए हैं, जिनका समाधान समय और संतुलन दोनों की मांग करता है। मनरेगा में प्रस्तावित बदलाव साहसिक है, पर उसका प्रभाव ग्रामीण महिलाओं और आजीविका पर कैसे पड़ेगा, यह आने वाला समय तय करेगा।

आर्थिक और डिजिटल मोर्चे पर मोदी की गति निरंतर बनी हुई है। सुधारों की प्रक्रिया रुकी नहीं, बल्कि और अधिक सशक्त हुई है। आधारभूत संरचना, विनिर्माण प्रोत्साहन, डिजिटल सार्वजनिक प्रणाली और व्यापार सुगमता ने अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है। वैश्विक झटकों के बावजूद विकास बनाए रखना प्रशासनिक दक्षता का प्रमाण है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था और किफायती तकनीक पर जोर युवाओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करता है, हालांकि असमानता और रोजगार जोखिम जैसे प्रश्न अभी भी उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मोदी की विशेषता यही है कि वे चुनौतियों से आंख नहीं चुराते, बल्कि समाधान की ओर बढ़ते हैं।

विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता मोदी युग की स्थायी पहचान बनी हुई है। चीन के साथ संतुलन, पड़ोसी देशों के साथ पुनर्संयोजन और पाकिस्तान के प्रति सतर्क दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि कठोरता और व्यावहारिकता साथ चलते हैं। जर्मनी के साथ समझौते और नौसैनिक सहयोग भारत की वैश्विक भूमिका को और मजबूत करते हैं। भारत अब केवल नियम मानने वाला देश नहीं, बल्कि नियम निर्माण में सहभागी बन रहा है, हालांकि घरेलू राजनीति में सामाजिक संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। विकास की गति और सामाजिक एकता के बीच संतुलन साधना इस दौर की सबसे कठिन, लेकिन सबसे आवश्यक जिम्मेदारी है।

2026 केवल एक कैलेंडर वर्ष नहीं, बल्कि नीतिगत परीक्षा का समय है। एक राष्ट्र एक चुनाव, न्यायिक सुधार और दीर्घकालिक विकास की परिकल्पना मोदी की दूरदृष्टि को दर्शाती है। हजार वर्षों की सभ्यतागत चेतना को आधुनिक शासन से जोड़ना सरल कार्य नहीं है। संसद से समाज तक संवाद बनाए रखना उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि नीति और जनमानस के बीच दूरी बढ़ी, तो उपलब्धियां कमजोर पड़ सकती हैं, इसलिए सहभागिता को केंद्र में रखना अनिवार्य हो जाता है। मोदी यह जानते हैं कि नेतृत्व केवल निर्णय लेने से नहीं, बल्कि विश्वास बनाए रखने से टिकता है। इसलिए उनका हर कदम यह संकेत देता है कि परिवर्तन तभी स्थायी होगा जब सहभागिता बनी रहे।

नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली एक ऐसी प्रवाहमान धारा है जो विरोधों के बीच भी दिशा नहीं बदलती। वे संकट में अवसर और अंधड़ में संभावना खोजते हैं। भारत को रुकने की अनुमति नहीं, यही उनका मूल मंत्र है। यह समय केवल एक नेता का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की सामूहिक यात्रा का प्रतीक है। मार्ग कठिन है, लेकिन संकल्प स्पष्ट है। यदि आंतरिक एकता बनी रही और संवाद जीवित रहा, तो हर चुनौती सीढ़ी बन सकती है। मोदी का संदेश स्पष्ट है, गति थमती नहीं, दृष्टि झुकती नहीं और लक्ष्य बदलता नहीं। भारत आगे बढ़ेगा, क्योंकि रुकना विकल्प नहीं है।

 

 

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