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न्यू ईयर में नेता और टेंप्रेचर में गिरने की होड़ In the New Year, there's a competition between politicians and the temperature to see who can drop the most.


                        • रवि उपाध्याय 

दोस्तों, आप सब को मेरा हैप्पी न्यू ईयर। मित्रों, एक बार फिर से न्यू ईयर आ गया। अबकी टू जीरो अपने साथ टू सिक्स ले कर आया है। यह वैसा ही है जैसा वन टू का फोर और फोर टू का वन होता है। नया साल कब कैसे रंग बदले ना मैं जानू न तुम जानो। पूरी दुनिया नया साल यानि हैप्पी न्यू ईयर 2026 मना रही है। मेरे भारत में भी हम सभी एक दूजे को खुश हो कर हैप्पी न्यू ईयर की बधाई दे रहे हैं।


हम 2005 के आखिरी महीने दिसम्बर से देखते चले आ रहे हैं कि इस दरम्यान टेंप्रेचर और नेता में गिरने की होड़ चल रही है। अब देखना यह है कि नेता इस मामले में तापमान यानि पारे को मात दे पाते हैं या तापमान नेता को परास्त करने में सफ़ल होता है। दोनों के बीच यह रेस देखना खूब दिलचस्प होगा। फ़िलहाल इंदौर में यह तमाशा देखा जा रहा है। पहले दौर में तो टेंप्रेचर हारता हुआ दिख रहा है। नेता जी ने घंटा बजा कर यह ऐलान कर दिया है कि टेंप्रेचर को हरा दिया गया है।


एक नेता यहां गिरा तो दूसरा नेता वॉशिंगटन में गिरा। वहां उनका गिरना देख कर टेंप्रेचर भी मुंह छिपा कर देखता रहा। भाई ने नए साल के तीसरे दिन ही मानवता और एक देश की संप्रभुता को धता बताते हुए भूरा बाल ने तेल की लालच में वेनेजुएला पर धावा बोल कर वहां के राष्ट्रपति और उनकी बेगम को गिरफ्तार कर लिया। यह दुनिया जानती है कि अमेरिका सबसे बड़ा तेली है। वो जहां चाहता है तेल डाल कर तीली को घिस देता है।


नेताओं का गिराना क्रम केवल इंदौर और वाशिंगटन में ही नहीं देखा गया है बल्कि इसे हमारे पड़ोसी बांग्लादेश में भी देखा जा सकता है। वहां भी नोबल प्राइज विनर युनुस मियां भी इतना गिर गया कि इंसानियत की कब्रें बना दी गईं।कहते हैं कि उन्हें नोबल अवार्ड माइक्रो फाइनेंस के जरिए गरीबी मिटाने के लिए दिया गया था। उन्हीं ने इंसानियत को माइक्रो लेवल तक मिटाने का तय किया है। एक नोबल अवार्ड विजेता है तो दूजा है नोबल एस्पिरेंट और तीसरा है नोबल अवार्ड के लिए भूरे भाई को प्रपोज करने वाला। इन तीनों के बीच तापमान से भी तेज़ी से नीचे गिरने की होड़ जारी है। हमको पूरा भरोसा है कि यह नेता वहां तक गिरने का रिकॉर्ड कायम कर के ही मानेंगे जहां तक टेंप्रेचर कभी भी नहीं गिरा होगा।


यह अफसोस की बात है कि जिस शहर का नाम देश और दुनिया में सबसे ज्यादा साफ शहर के रूप में था।आज वही शहर दुनिया भर में दूषित पानी से मौतों के लिए चर्चा में हैं। अफसोस तो इस बात पर भी है जो नेता लोकप्रियता के मामले में कैलाश पर्वत पर बैठा था वह धड़ाम से नीचे आ गया। इतना नीचे कि जितना नीचे पारा भी जाने में खुद शर्मिंदा महसूस करे। सन् 2025 से दुनिया में हिंसा, आक्रमण,युद्ध और इंसानियत के गिरने का यह सिलसिला इस नए साल 2026 में भी चालू रहने कीआशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। आने को तो हर साल एक नया साल आता है पर बदलता कुछ नहीं है। यदि कुछ बदलता है तो बस वह एक अंक आगे खिसक जाता है। हां यदि कुछ नहीं परिवर्तित होता है तो वह है उम्मीद। इसी उम्मीद के दम पर ही हम एक दूसरे को कांग्रेचुलेशन देते हुए हैं कहते हैं -- हैप्पी न्यू ईयर।


मनुष्य का स्वभाव हमेशा से आशावादी रहा है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। आशावादी होने से जीवन में उत्साह का संचार होता है। सदियों से यह रिवाज़ है कि न्यू ईयर की पूर्व संध्या से ही उसके स्वागत की तैयारी शुरू हो जातीं हैं। रात को ही नाच गाना शुरू हो जाता है। दारू के जाम टकराना शुरू हो जाते हैं। नए साल का असली रंग तो धीरे धीरे उसी तरह हमारे सामने आ जाता है जैसे नई बहु के कारनामे तो दो चार महीने बाद ही सामने आते हैं लेकिन तब तक चिड़िया खेत चुग कर फुर्र हो चुकी होती है। और फिर यही गाना होठों पर बरबस आ जाता है करूं कि आस निराश भई, करूं क्या आस निराश भई। आदमी का जन्म ही आसा निराशा के झूले पर झूलता रहा है। मुगल आए उनसे आस लगाई,अंग्रेजों से आस लगाई, उसके बाद नेताओं से आस लगाई पर सब से निरासा ही हाथ लगी।

लगता है आदमी का जन्म ही धोखा खाने के लिए हुआ है। कभी अपनो से धोखा मिलता है तो कभी परायों से मिलता है। कभी नेताओं से धोखा मिलता है। आप सोचेंगे कि नेताओं का अलग से क्यों उल्लेख किया है। तो भाइयों ये जान लो कि नेता ही वह प्रजाति है जो न अपनों के प्रति भरोसे मंद होती है और न परायों के प्रति। इस प्रजाति पर तो इनकी अपनी पत्नी भी भरोसा नहीं करतीं हैं। अंग्रेजी शासन के दौरान मेरे देश से अफ्रीका में गिरमिटिया मजदूर गए थे। अंग्रेजी शासन की विदाई होने के बाद हमारे यहां जब लोकतंत्र आया तो धीरे धीरे यहां के नेता भी गिरगिटिया हो गए हैं। जिस तरह तोता नजरें फेर लेने के लिए मशहूर है उसी तरह नेता भी काम निकलने के बाद नजरे फेर लेने के लिए ख्यातनाम हैं

( लेखक व्यंग्यकार एवं एक राजनैतिक समीक्षक हैं। )

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