सिलीगुड़ी: इतिहास का अगला दबाव-बिंदु]
[जब नदियाँ हथियार बनें और परियोजनाएँ रणभूमि]
· प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
इतिहास बताता है कि युद्ध हमेशा बंदूकों से नहीं लड़े जाते; कई बार नदियाँ, सड़कें और परियोजनाएँ ही हथियार बन जाती हैं। आज भारत के उत्तर-पूर्वी प्रवेशद्वार पर ऐसा ही एक खतरनाक खेल रचा जा रहा है। उत्तर बांग्लादेश की शांत दिखने वाली सीमाओं के पीछे एक गहरी रणनीतिक चाल आकार ले रही है, जिसका केंद्र तीस्ता नदी है और निशाना भारत का सिलीगुड़ी कॉरिडोर—देश की तथाकथित “चिकन नेक”। जनवरी 2026 में चीनी राजदूत याओ वेन का बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ तीस्ता परियोजना स्थल का दौरा महज औपचारिक निरीक्षण नहीं था, बल्कि भारत की सामरिक नब्ज को टटोलने का साहसिक प्रयास था। भारत की जीवनरेखा से कुछ ही किलोमीटर दूर हुआ यह दौरा इसे सामान्य नहीं, बल्कि असाधारण रूप से चिंताजनक बनाता है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर केवल 22 किलोमीटर चौड़ा वह संकरा गलियारा है जो भारत की मुख्य भूमि को उसके आठ पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से घिरे इस क्षेत्र में यदि कभी अवरोध पैदा हुआ, तो पूरा पूर्वोत्तर देश से कट सकता है। चीन इस भौगोलिक कमजोरी को वर्षों से समझता रहा है और अब उसे भुनाने की दिशा में ठोस कदम उठाता दिख रहा है। तीस्ता मास्टर प्लान के नाम पर ड्रेजिंग, तटबंध, जलाशय और भूमि पुनर्प्राप्ति जैसे कार्य प्रस्तावित हैं, जिनमें चीनी कंपनियों की प्रमुख भूमिका बताई जा रही है। बांग्लादेश इसे विकास का अवसर बता रहा है, लेकिन सामरिक विशेषज्ञों के लिए यह वह कसती रस्सी है जो धीरे-धीरे भारत की गर्दन के चारों ओर डाली जा रही है।
मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार का रुख इस आशंका को और गहरा करता है। जल संसाधन सलाहकार सैयदा रिजवाना हसन का चीनी राजदूत के साथ मौके पर जाना और चीन की “तत्काल रुचि” को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना संकेत देता है कि ढाका अब दिल्ली की संवेदनाओं से अधिक बीजिंग की ओर झुक रहा है। लालमोनिरहाट एयरबेस को पुनः सक्रिय करने की चर्चाएँ और वहां संभावित चीनी मौजूदगी की आशंका पूरे घटनाक्रम को और भी संदिग्ध बना देती है। ये सभी कड़ियाँ मिलकर ऐसा परिदृश्य रचती हैं, जिसमें विकास की आड़ में सैन्य और खुफिया संभावनाओं के बीज बोए जा रहे हैं।
भारत-बांग्लादेश संबंधों की पृष्ठभूमि पहले से ही तनाव से भरी रही है। तीस्ता जल बंटवारे पर 2011 का अंतरिम समझौता आज तक अधर में अटका है। पश्चिम बंगाल की आपत्तियाँ और केंद्र-राज्य समन्वय की कमी ने इस मसले को सुलझने नहीं दिया। अब इसी भ्रम और खालीपन का लाभ चीन उठाता दिख रहा है। दिसंबर 2025 में ढाका में हुए भारत-विरोधी प्रदर्शन और भारतीय दूतावास पर हमले की कोशिशों ने स्पष्ट कर दिया था कि बांग्लादेशी राजनीति में भारत के प्रति माहौल बदल चुका है। यूनुस का पूर्वोत्तर को “लैंडलॉक्ड” बताकर तंज कसना और चीन की आर्थिक ताकत का उल्लेख करना, इस बदले रुख की खुली अभिव्यक्ति थी।
तीस्ता परियोजना के लिए चीन से मांगा गया 853 मिलियन डॉलर का ऋण केवल एक आर्थिक लेन-देन नहीं, बल्कि रणनीतिक निर्भरता की शुरुआत है। इतिहास गवाह है कि जहां-जहां चीन ने कर्ज के जरिये प्रवेश किया, वहां उसने धीरे-धीरे राजनीतिक और सैन्य प्रभाव भी कायम किया। श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह इसका सशक्त उदाहरण है। यदि तीस्ता पर चीन की पकड़ मजबूत होती है, तो जल नियंत्रण भविष्य में दबाव का औजार बन सकता है। सूखे में पानी रोकना या मानसून में बाढ़ की स्थिति बनाना, पूर्वोत्तर राज्यों में अस्थिरता फैलाने के लिए काफी होगा।
भारतीय खुफिया एजेंसियां इस खतरे को हल्के में नहीं ले रही हैं। रॉ और अन्य सुरक्षा संस्थान तीस्ता क्षेत्र में चीनी गतिविधियों पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। आशंका यह भी है कि इंजीनियरिंग और तकनीकी टीमों के साथ-साथ खुफिया नेटवर्क भी जमीन पर सक्रिय किए जा सकते हैं। यदि सिलीगुड़ी कॉरिडोर के आसपास किसी भी तरह की सैन्य या निगरानी संरचना खड़ी होती है, तो यह भारत की सुरक्षा के लिए सीधी चुनौती होगी। यह केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अखंडता से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है।
चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की पृष्ठभूमि में तीस्ता परियोजना को देखें तो पूरी तस्वीर और भी साफ हो जाती है। दक्षिण एशिया में भारत को घेरने की रणनीति के तहत पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और अब बांग्लादेश में चीनी मौजूदगी लगातार बढ़ाई जा रही है। आर्थिक सहायता, अस्पताल, सड़कें और बांध—ये सभी केवल साधन हैं, असली लक्ष्य है प्रभाव और नियंत्रण। बांग्लादेश के लिए यह सौदा अल्पकाल में लाभकारी लग सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह उसकी संप्रभुता के लिए जोखिम भरा सिद्ध हो सकता है।
अब भारत के सामने समय की सबसे कठिन परीक्षा है। कूटनीतिक शिष्टाचार से आगे बढ़कर स्पष्ट और ठोस रणनीति अपनाना आवश्यक हो गया है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा को अभेद्य बनाना, सीमाओं पर निगरानी और आधारभूत ढांचे को सशक्त करना, तथा पूर्वोत्तर को हर मौसम में निर्बाध रूप से जोड़ने वाली वैकल्पिक व्यवस्थाएँ विकसित करना अनिवार्य है। साथ ही, तीस्ता जल समझौते पर राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए समाधान निकालना होगा, ताकि चीन को हस्तक्षेप का अवसर ही न मिले।
यदि समय रहते इस खतरे को नहीं समझा गया, तो “चिकन नेक” केवल एक उपमा नहीं, बल्कि भारत की वास्तविक कमजोरी बन सकती है। यह सिर्फ एक नदी या एक परियोजना का प्रश्न नहीं है, बल्कि देश की एकता, संप्रभुता और भविष्य की दिशा से जुड़ा निर्णायक क्षण है। आज भारत को सतर्क, संगठित और निर्णायक होना होगा, क्योंकि इतिहास उसी को याद रखता है जो आने वाले खतरे को समय रहते पहचानकर उसका सामना करता है।

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