सम्पादकीय
करीब दो दशकों के कूटनीतिक इंतजार, अनगिनत दौर की बातचीत और वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरणों के बीच मंगलवार को भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) ने जिस मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की नींव रखी है, वह दोनों ही पक्षों के लिए अभूतपूर्व अवसर लेकर आया है। इस समझौते की रणनीतिक अहमियत को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने उचित ही इसे ऐतिहासिक, तो यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने दुनिया की दो बड़ी आर्थिक शक्तियों के बीच साझेदारी का एक नया अध्याय और ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ करार दिया है।
उन्होंने यह भी कहा कि सफल भारत दुनिया को बेहतर बनाएगा।दुनिया की कुल जीडीपी का लगभग 25 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार का करीब एक-तिहाई हिस्सा रखने वाली अर्थव्यवस्थाओं के बीच हुए इस समझौते का समय भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक तरफ जहां रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पैदा हुए मतभेदों को पीछे छोड़कर यूरोप अब भारत को एक महत्वपूर्ण और भविष्य के अनिवार्य साझेदार के रूप में देख रहा है, तो दूसरी ओर चीन पर निर्भरता कम करने की छटपटाहट ने भी भारत को उसके लिए एक भरोसेमंद विकल्प बना दिया है।भारत भी यह स्पष्ट कर चुका है कि वह किसी एक धुरी पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए वैश्विक विकल्प खुले रखेगा। गौरतलब है कि भारत-ईयू के बीच हुए इस समझौते का सबसे बड़ा आकर्षण एक-दूसरे के बाजारों तक सुलभ पहुंच है
। इसके तहत यूरोपीय संघ के 27 देशों को भारत के विशाल बाजार तक व्यापक पहुंच मिलेगी। लगभग 97 फीसदी यूरोपीय निर्यात पर शुल्क या तो कम होगा या पूरी तरह समाप्त किया जाएगा, जिससे मशीनरी, ऑटोमोबाइल, तकनीकी उपकरण और रसायन जैसे उत्पाद सस्ते होंगे। बदले में भारत के कपड़ा, चमड़ा, रत्न-आभूषण और अन्य श्रम-प्रधान क्षेत्रों को यूरोप में शून्य-शुल्क पहुंच मिलेगी, जिससे निर्यात बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।हालांकि, देश के ऑटोमोबाइल उद्योग, जो अब तक उच्च टैरिफ के सहारे सुरक्षित रहा है, को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, भारतीय उपभोक्ताओं के लिए, कम कीमतों पर यूरोपीय उत्पादों के आने से गुणवत्ता, विकल्प और सुरक्षा मानकों में भले ही सुधार हो, पर इससे घरेलू उत्पादकों पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव भी बढ़ सकता है। लिहाजा, इस समझौते को दीर्घकालिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। खंडित दुनिया में यह समझौता सहयोग की मिसाल है। अगर प्रभावशाली ढंग से लागू हुआ, तो यह आपूर्ति शृंखलाओं को नया रूप देगा, उपभोक्ताओं को सशक्त बनाकर देशों के बीच सहयोग का एक नया आदर्श प्रस्तुत करेगा। जैसा उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा भी है, यह तो बस शुरुआत है।

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