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सारे दुख विचारों से पैदा होते हैं ?Do all sorrows originate from thoughts?

 सम्पादकीय

मार्कस ऑरेलियस रोम का सम्राट था, पर उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी तलवार नहीं, उसका मन था। युद्ध, षडयंत्र, विश्वासघात और मृत्यु की छाया के बीच जीते हुए भी वह शांत रहना जानता था। उसने कहा था – “घटना आपको चोट नहीं पहुंचाती, आपकी प्रतिक्रिया पहुंचाती है।” यही स्टोइक दर्शन का सार है – जीवन को बदलना कठिन है, पर अपने विचारों को संभालना संभव है।


मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह उन चीजों को नियंत्रित करना चाहता है जो उसके वश में होती ही नहीं – लोग क्या कहेंगे, परिस्थितियां कैसे बदलेंगी, किसका व्यवहार कैसा होगा, दुनिया हमें कैसे देखेगी। जितना अधिक हम बाहरी दुनिया को अपने अनुसार ढालना चाहते हैं, उतनी ही अधिक पीड़ा बढ़ती है। मार्कस ने कहा था – “जिसे तुम नियंत्रित नहीं कर सकते, उसे अपना शत्रु मत बनाओ।” पर हम रोज ऐसा ही करते हैं।

यदि कोई हमारे बारे में गलत बोल दे, तो हमारा मन जल उठता है। यदि कोई योजना बिगड़ जाए, तो हम बेचैन हो जाते हैं। यदि कोई प्रिय व्यक्ति उम्मीद के अनुसार बर्ताव न करे, तो हम टूट जाते हैं। हम सोचते हैं दुख बाहर से आया है, जबकि वह अंदर की असमर्थ प्रतिक्रिया से पैदा होता है।

स्टोइक दृष्टिकोण कहता है कि दुनिया में केवल दो चीजें हैं – वे जो हमारे नियंत्रण में और वे जो पूरी तरह नियंत्रण के बाहर। हमारे नियंत्रण में केवल तीन तत्व हैं – हमारी दृष्टि, हमारा व्यवहार और हमारा मन। बाकी सब जीवन की नदी की तरह है – वह बहती है, बदलती है, मुड़ती है, कभी शांत, कभी उफनती। पर नदी को रोकने की कोशिश करने वाला ही डूबता है। जो बहाव के साथ चलता है, वही किनारे तक पहुंचता है।

मार्कस ऑरेलियस हर रात सोने से पहले एक बात लिखते थे – “आज किसी ने मेरे साथ अच्छा भी किया और बुरा भी। अच्छा मेरे सौभाग्य से आया और बुरा मेरी परीक्षा के लिए।” यह वाक्य दर्द को हल्का नहीं करता, बल्कि मन को मजबूत बनाता है। जब आप यह मान लेते हैं कि हर स्थिति आपको कुछ सिखाने आई है, तो शिकायत की जगह समझ आ जाती है।

एक दूसरा सच यह है कि हमारा दुख घटनाओं से नहीं, हमारी कहानियों से पैदा होता है। घटना कहती है – “यह हुआ।” मन कहता है – “यह क्यों हुआ? मेरे साथ ही क्यों हुआ?” और इसी प्रश्न में पीड़ा छिपी रहती है। यदि हम केवल घटना को देखें, तो मन शांत रहता है। पर यदि मन कहानी बनाना शुरू करे, तो जीवन बोझ जैसा लगता है।

मार्कस का एक और बड़ा वाक्य है – “जिसे तुम बदल नहीं सकते, उसे स्वीकार कर लो।” कितना ताकतवर वाक्य है यह। अकेले अगर इसी वाक्य को जीवन पर लागू किया, तो दुख से मुक्त हो जाओगे। याद रखिए कि स्वीकार करना हारना नहीं है बल्कि यह अपने मन को बचाना है। जब हम स्वीकार करते हैं, तो भीतर एक अद्भुत हल्कापन आता है। उस हल्केपन में हम समझ पाते हैं कि जीवन हर समय हमारे अनुसार नहीं चलेगा, पर हमारा मन हर समय हमारी पकड़ में रह सकता है। और समय को भी हम मजबूत मन के साथ देर-सबेर अपने अनुकूल बना सकते हैं।

इस संसार में कोई भी मनुष्य बाहरी तूफानों को रोक नहीं सकता, पर हर मनुष्य यह तय कर सकता है कि वह भीतर कैसा मौसम बनाना चाहता है। यदि मन की खिड़कियां बंद हों, तो बाहर की आंधी भीतर नहीं घुस सकती।

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