अजय कुमार बियानी
इंजीनियर
अस्त्र का उत्तर अस्त्र से देना कई बार अनिवार्य हो सकता है, किंतु विचारों का उत्तर विचारों से ही दिया जाना चाहिए। जब किसी लेख, कविता या पुस्तक के प्रतिवाद में तलवार निकल आती है, तो वह शक्ति का नहीं, असहजता और भय का प्रमाण होती है। इतिहास गवाह है कि जहाँ तर्क कमजोर पड़ता है, वहीं हिंसा का सहारा लिया जाता है। यह प्रवृत्ति किसी एक भूभाग तक सीमित नहीं रही; अलग-अलग महाद्वीपों में, अलग-अलग समयों में, विचारों से भागने की यह आदत बार-बार दिखाई देती है।
विचारों से डरना किसी भी मत या व्यवस्था के भीतर आत्मविश्वास की कमी को उजागर करता है। यदि कोई विचार सशक्त है, तो वह प्रश्नों से घबराता नहीं, बल्कि संवाद से और निखरता है। इसके विपरीत, असहमति को दबाने की कोशिश, धमकी और हिंसा का प्रयोग, यह संकेत देता है कि भीतर कहीं न कहीं संशय पल रहा है। ऐसा ढांचा कितने समय तक टिक सकता है—यह प्रश्न केवल नैतिक नहीं, व्यावहारिक भी है।
दुर्भाग्य यह है कि समाजों में अक्सर बुनियादी प्रश्नों से ध्यान हटाकर लोगों को भावनात्मक और राजनीतिक उलझनों में उलझाए रखा जाता है। इतिहास को खंडित करके प्रस्तुत किया जाता है, ताकि असुविधाजनक सवाल न उठें। पर संस्कृति और भूगोल किसी एक काल की देन नहीं होते; वे सहस्राब्दियों की निरंतरता से बनते हैं। जब उस निरंतरता को नकारकर वर्तमान को ही अंतिम सत्य मान लिया जाता है, तब भ्रम पैदा होता है—और उसी भ्रम से टकराव जन्म लेता है।
सौभाग्य से, दुनिया में एक दूसरी प्रक्रिया भी समानांतर चल रही है। कई समाजों के भीतर विवेकशील पुनर्विचार का स्वर उभर रहा है। बाहरी ढांचे, संस्थाएँ और प्रतीक भले बढ़ते दिखें, पर आंतरिक मनोजगत में प्रश्न, दुविधाएँ और आत्मालोचना भी बढ़ रही हैं। यह टकराव दो प्रवृत्तियों के बीच है—एक जो जड़ता को पोषित करती है और दूसरी जो विवेक को। अंतिम परिणाम भले अनिश्चित लगे, पर दिशा स्पष्ट है: दीर्घकाल में वही समाज आगे बढ़ता है जो प्रश्नों को स्थान देता है।
एक तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक है। विश्व के अनेक हिस्सों में अलग-अलग समुदाय प्रवासी के रूप में साथ रहते हैं और शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व निभाते हैं। वहाँ मतभेद होते हैं, पर वे हिंसा का रूप नहीं लेते। इसके विपरीत, जहाँ विचारधारात्मक कठोरता प्रबल हो जाती है, वहाँ टकराव बाहरी ही नहीं, आंतरिक भी बन जाता है। जब दूसरे न हों, तो संघर्ष अपने ही बीच फूट पड़ता है। यह संकेत देता है कि समस्या व्यक्तियों में नहीं, विचार-व्यवस्था की जकड़न में है।
किसी भी मत या दर्शन में आध्यात्मिक और सामाजिक पक्ष होते हैं। संकट तब आता है जब सामाजिक-राजनीतिक व्याख्याएँ स्वयं को अंतिम और निर्विवाद घोषित कर देती हैं। तब सहिष्णुता कमजोर पड़ती है और सत्ता-संरक्षण प्रधान हो जाता है। जब नियम मनुष्यता से ऊपर रख दिए जाते हैं, तब मनुष्य साधन बन जाता है। यही वह मोड़ है जहाँ शिक्षा की भूमिका निर्णायक हो जाती है।
शिक्षा का अर्थ केवल जानकारी नहीं, विवेक का विकास है। प्रमाण, तर्क और अनुभव—इन तीनों की कसौटी पर हर मान्यता की जाँच होनी चाहिए। कोई भी धारणा, चाहे कितनी ही पुरानी क्यों न हो, यदि मनुष्यता के विरुद्ध जाती हो, तो उस पर पुनर्विचार आवश्यक है। यह प्रक्रिया अपमान नहीं, परिपक्वता का संकेत है। समाज तब आगे बढ़ता है जब वह अपने विश्वासों को भी प्रश्नों के सामने रखने का साहस करता है।
हिंसा का विकल्प सैन्य शक्ति नहीं, बौद्धिक साहस है। संवाद से भागना आसान है, पर उससे समस्याएँ सुलझती नहीं, सड़ती हैं। शिक्षा वह मार्ग है जो मनुष्य को प्रमाण मांगना सिखाती है, भावनाओं के शोर में विवेक को बचाए रखती है और असहमति को शत्रु नहीं, अवसर मानना सिखाती है।
आज आवश्यकता है कि हम विचारों को विचारों से ही परखें। धमकी, भय और दमन से किसी भी मत की रक्षा नहीं होती। रक्षा होती है संवाद से, आत्मालोचना से और उस साहस से, जो कह सके—यदि कोई बात मनुष्यता के अनुकूल नहीं, तो उसे बदलना होगा। यही रास्ता समाजों को स्थिर शांति की ओर ले जाता है।

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