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संगठन की अनदेखी करती कांग्रेस, स्थानीय जनता और नेतृत्व की आकांक्षाओं पर ध्यान नहींThe Congress party is neglecting the organization and failing to pay attention to the aspirations of the local people and leadership.

सम्पादकीय


कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने गत दिनों अपनी एक्स पोस्ट में लिखा, ‘आरएसएस का जमीनी स्वयंसेवक और जनसंघ-भाजपा का कार्यकर्ता नेताओं के चरण में बैठकर प्रदेश का मुख्यमंत्री और देश का प्रधानमंत्री बना। ये संगठन की शक्ति है।’ इन शब्दों के मायने तब खुलते हैं, जब इसके साथ चस्पां एक तस्वीर दिखती है। 1995 की उस तस्वीर में नरेन्द्र मोदी पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के पास फर्श पर बैठे हैं। दिग्विजय सिंह के ये शब्द कांग्रेस नेतृत्व और संगठन के कामकाज पर एक तरह से टिप्पणी हैं।


कांग्रेस नेतृत्व की कार्यशैली और संगठन की लचर हालत पर टिप्पणी करने वाले दिग्विजय पहले शख्स नहीं हैं। केंद्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी के उभार के बाद कांग्रेस लगातार फिसल रही है। हाल में उसे और उसके सहयोगी दलों को उस बिहार में भी हार झेलनी पड़ी, जिसे महज दो महीने पहले ही वह जीता हुआ मान चुकी थी। उसकी निराशा महाराष्ट्र और गोवा के निकाय चुनावों ने भी बढ़ाई है। इस बीच केरल के निकाय चुनावों ने उसे जरूर सांत्वना दी है, लेकिन वह इतनी कारगर नहीं है कि पार्टी और उसके जमीनी कार्यकर्ता भविष्य के प्रति व्यापक रूप से आश्वस्त हो सकें।


कांग्रेस के अध्यक्ष भले ही मल्लिकार्जुन खरगे हों, लेकिन सबको पता है कि पार्टी की असल कमान किसके हाथ है। पार्टी के असल बास राहुल गांधी हैं। इस लिहाज से पार्टी उन्हीं के हिसाब से चल रही है। राहुल तेजतर्रार और आक्रामक हैं, लेकिन उनकी यह आक्रामकता नतीजों में नहीं बदल रही। उनकी शैली एक हद तक वामपंथी वैचारिकी और राजनीति की तरह है। वामपंथी नैरेटिव गढ़ने में कामयाब रहते हैं, लेकिन नतीजों के मोर्चे पर नाकाम रहते हैं। 2019 के चुनाव में उन्होंने ‘चौकीदार चोर’ का नैरेटिव तैयार किया। 2024 में ‘खतरे में संविधान’ का आख्यान खड़ा किया। हाल में ‘वोट चोरी’ का आरोप चस्पां किया। वामपंथी इकोसिस्टम के जरिये ये सारे इस कदर स्थापित हुए कि लगा कि इनकी चक्करघिन्नी में भाजपा फंस गई। भाजपा कई बार चिंतित भी दिखी, लेकिन उसके नेतृत्व ने होश नहीं खोया।


नतीजे सामने हैं। कांग्रेस के कई नैरेटिव उलटे भी पड़ते हैं, क्योंकि वे जमीनी समझ के बिना गढ़े जाते हैं। बिहार के संदर्भ में पार्टी नेतृत्व के एक वर्ग का मानना है कि जब राहुल ने वोटर जागरूकता यात्रा निकाली, तब मिथिला समेत उत्तर बिहार में सवर्ण, विशेषकर सवर्ण मतदाताओं का कांग्रेस को लेकर रुख बदल रहा था, लेकिन बाद में उन्हीं ब्राह्मणों और सवर्णों को आततायी बताने का नैरेटिव गढ़ा गया, लिहाजा मतदान में हालात बदल गए। अपने वामपंथी सोच के चलते कांग्रेस से समूचे देश का सवर्ण मतदाता दूर होता जा रहा है। और तो और जब देश और संसद में ज्यादा जरूरत होती है, तब राहुल विदेश में भाषण दे रहे होते हैं। इसके चलते संगठन की लगातार अनदेखी हो रही है।


कांग्रेस के कई अहम सूत्र एकमत हैं कि संगठन को दुरुस्त करने पर पार्टी नेतृत्व का ध्यान नहीं है। उदाहरण के लिए, लोकसभा चुनाव के वक्त हरियाणा में न तो सचिव था, न ही पार्टी की जिला कमेटियां काम कर रही थीं। ऐसा ही हाल बिहार का भी था। जिला स्तरीय कमेटियां थी नहीं। कई राज्य ऐसे हैं, जहां अध्यक्ष तो बना दिए गए हैं, लेकिन वहां कमेटी ही नहीं है। मुंबई में तो बीएमसी चुनाव के नामांकन के आखिरी दिन तक पता ही नहीं रहा कि कांग्रेस का गठबंधन किसके साथ है और कौन कहां से लड़ेगा। मनरेगा का नाम और चेहरा बदलने के खिलाफ कांग्रेस राज्यों की राजधानियों में रैलियां करने जा रही है। इस पर पार्टी के एक बड़े नेता का कहना है कि दूसरी रैलियों की ही तरह इन रैलियों का भी हश्र होगा। उनके हिसाब से ब्लाक स्तर पर मनरेगा के जाब कार्डधारकों का विरोध-प्रदर्शन आयोजित होना चाहिए था, फिर जिला स्तर पर उन्हें जुटाया जाता। बाद में राज्यों की राजधानी और दिल्ली में उनका जुटान होता। इससे पार्टी की बात निचले स्तर तक पहुंचती और नए वोटर भी बनते।


भाजपा आज अगर चुनाव जीत रही है तो इसकी वजह यह नहीं है कि वह सिर्फ अपने राष्ट्रीय नैरेटिव के सहारे चुनाव लड़ती है। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के अपने केंद्रीय विचार के साथ ही वह स्थानीय हालात के लिहाज से रणनीति बनाती है और उस पर अमल करती है। वह स्थानीय स्तर पर अपने कार्यकर्ताओं का भी ध्यान रखती है, लेकिन कांग्रेस यहां चूक रही है। वह समूचे देश में अपने केंद्रीय नैरेटिव के सहारे चुनाव लड़ती है, स्थानीय जनता और नेतृत्व की आकांक्षाओं और संस्कृति का वह ख्याल नहीं कर रही।


उसकी नाकामियों पर ब्रेक नहीं लगने की एक बड़ी वजह उसका यह सोच भी है। दिग्विजय सिंह कांग्रेस की इन्हीं खामियों की ओर ध्यान दिला रहे हैं। वे केंद्रीय नेतृत्व को अपनी रणनीति बदलने का संकेत देने की कोशिश कर रहे हैं। जमीनी समझ वाले स्थानीय नेतृत्व को उभारने और संगठन बनाने पर जोर देने की वे कवायद कर रहे हैं। उनका मानना है कि सिर्फ नैरेटिव गढ़ने से कुछ नहीं होने वाला, इसके लिए जमीनी संघर्ष का माद्दा भी होना चाहिए। शशि थरूर पहले से ही ऐसे संकेत दे रहे हैं। हालांकि कांग्रेस आलाकमान उनकी अनदेखी कर रहा है। कुछ ऐसा ही दिग्विजय के साथ भी हो सकता है।

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