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ग्वालियर स्वास्थ्य विभाग में 'अंधेरगर्दी', कलेक्टर का आदेश भी बेअसरChaos prevails in the Gwalior health department; even the Collector's orders are ineffective.

 

ग्वालियर। स्वास्थ्य विभाग में व्यवस्थाएं संभालने वाले आउटसोर्स कर्मचारी इन दिनों सिस्टम की लापरवाही और आउटसोर्स कंपनियों की मनमानी के दोहरे चक्रव्यूह में फंसे हैं। एक ओर सरकार श्रमिकों के हितों की बात करती है, वहीं दूसरी ओर ग्वालियर स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत इन कर्मचारियों को अर्धकुशल श्रमिक की निर्धारित दर तक नसीब नहीं हो रही है। हद तो यह है कि 11 महीनों से एरियर का इंतजार कर रहे इन कर्मचारियों को हर माह वेतन के लिए भी एड़ियां रगड़नी पड़ रही हैं।


कर्मचारियों के वेतन को लेकर कोई एकरूपता नहीं

हैरानी की बात यह है कि जिले में आउटसोर्स कर्मचारियों के वेतन को लेकर कोई एकरूपता नहीं है। मुख्य चिकित्सा व स्वास्थ्य अधिकारी और सिविल सर्जन के अधीन काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन में बड़ा अंतर है, जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और साठगांठ की ओर इशारा करता है। सीएमएचओ के अधीन अर्धकुशल श्रमिक दर पर कर्मचारियों को 11 हजार 400 रुपये का भुगतान किया जा रहा है, जबकि अर्धकुशल दर 13 हजार 146 रुपये है। सिविल सर्जन के अधीन कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों को 10 हजार 500 रुपये भुगतान किया जा रहा है। यह अंतर स्पष्ट करता है कि आउटसोर्स कंपनियां खुलेआम सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ा रही हैं और जिम्मेदार अधिकारी मूकदर्शक हैं।

अफसरों की ‘कागजी’ सख्ती: टेंडर निरस्त करने की हिदायत भी बेअसर

वेतन में देरी को लेकर सीएमएचओ कागजों पर तो आउटसोर्स कंपनियों के टेंडर निरस्त करने की चेतावनी दे चुके हैं, लेकिन धरातल पर इन कंपनियों के हौसले बुलंद हैं। न तो कंपनियों को विभाग का डर है और न ही प्रशासन की सख्ती का असर। चर्चा तो यहां तक है कि विभाग के कुछ अधिकारियों की इन कंपनियों के साथ अंदरूनी जुगलबंदी है, जिसके कारण नियम लागू करवाने के बजाय उन्हें संरक्षण दिया जा रहा है।

कलेक्टर के आदेश को भी ठेंगा: एरियर के लिए तरस रहे कर्मचारी

कर्मचारियों के एरियर भुगतान की स्थिति और भी बदतर है। स्वयं जिला कलेक्टर ने सीएमएचओ को पत्र लिखकर एरियर भुगतान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे। बावजूद इसके महीनों बीत जाने के बाद भी फाइलें धूल फांक रही हैं और कर्मचारियों के हाथ खाली हैं। जब नियम स्पष्ट है और कलेक्टर के निर्देश भी मौजूद हैं, तो फिर भुगतान में देरी और वेतन में कटौती क्यों हो रही है। जानकारों का कहना है कि यह पूरा खेल कमीशन और बंदरबांट का है। कार्रवाई के नाम पर केवल नोटिस जारी कर खानापूर्ति की जा रही है।

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