Top News

नए बाजार तलाशने की चुनौती, वैश्विक व्यापार की निरंतर बढ़ती कठिनाईThe challenge of finding new markets, and the ever-increasing difficulties of global trade.

 

सम्पादकीय

हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन देशों पर तत्काल प्रभाव से 25 प्रतिशत टैरिफ लागू कर दिया, जो ईरान के साथ कारोबार करते हैं। इन देशों में भारत भी शामिल है। अमेरिका ने भारत पर पहले ही 50 प्रतिशत टैरिफ लगा रखा है। ऐसे में अब भारत को 75 प्रतिशत टैरिफ का सामना करना होगा। ट्रंप ने सैंक्शनिंग रशिया एक्ट, 2025 को भी मंजूरी दी है।


इसके कानून बनने पर रूस से तेल खरीदने वाले भारत सहित अन्य देशों पर ट्रंप 500 प्रतिशत तक का दंडात्मक टैरिफ लगा सकते हैं। यदि भारत पर और टैरिफ लगाए जाते हैं, तो अमेरिका में भारत का सामान और सेवा निर्यात लगभग बंद जैसा हो जाएगा। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा और भारत से अमेरिका को निर्यात करीब 86.5 अरब डालर रहा।

पिछले कुछ वर्षों से भारत के कुल निर्यात में अमेरिका का योगदान लगातार 17-18 प्रतिशत रहा है। चूंकि भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौता अधर में लटका हुआ है, ऐसे में नई टैरिफ दरों के कारण अमेरिका के बाजार में प्रभावित होने वाले निर्यात की भरपाई के लिए भारत को तेजी से नई वैकल्पिक व्यवस्थाएं करनी होंगी।

इसके लिए आम बजट में निर्यात को प्रोत्साहन देने के उपाय करने होंगे। वैश्विक व्यापार की चुनौतियों के बीच भारत से निर्यात बढ़ाना कोई सरल कार्य नहीं है। इसके लिए भारत को द्विपक्षीय एवं मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के तहत निर्यात बढ़ाने की दिशा में तेजी से कदम उठाने होंगे। मौजूदा निर्यात बाजारों में हिस्सेदारी बढ़ाने के साथ-साथ नए निर्यात बाजारों की तलाश भी जरूरी है।

इसमें कोई दो मत नहीं कि इस वर्ष निर्यात बाजारों में प्रवेश के मद्देनजर ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ किए गए एफटीए का प्रभावी कार्यान्वयन अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। उम्मीद है अब पेरू, चिली, आसियान, मेक्सिको, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, इजरायल, गल्फ कंट्रीज काउंसिल सहित अन्य प्रमुख देशों के साथ भी एफटीए आकार लेते दिखाई देंगे। हाल में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की भारत यात्रा ने यूरोपीय संघ के साथ भारत के एफटीए के शीघ्र संपन्न होने की उम्मीदों को बल दिया है।

इसके अतिरिक्त, नए वर्ष में मारीशस, संयुक्त अरब अमीरात, आस्ट्रेलिया और चार यूरोपीय देशों-आइसलैंड, स्विट्जरलैंड, नार्वे और लिकटेंस्टाइन के समूह यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (ईएफटीए) के साथ हुए एफटीए के लाभ भी अधिक स्पष्ट रूप से सामने आने की संभावना है।

ट्रंप के टैरिफ के कारण अमेरिका में घटते निर्यात की क्षतिपूर्ति के लिए भारत ने दुनिया के प्रमुख बाजारों में निर्यात को सफलतापूर्वक बढ़ाया है। हाल में जारी विदेश व्यापार के आंकड़ों के अनुसार नवंबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच भारत का कुल निर्यात 15 प्रतिशत बढ़कर 64.05 अरब डालर से 73.99 अरब डालर हो गया है। ट्रंप द्वारा लगातार बढ़ाए गए टैरिफ के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था तेज गति से आगे बढ़ रही है। विश्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर के अनुमान को 6.3 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.2 प्रतिशत कर दिया है। आज भारत दुनिया के प्रमुख देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार तेजी से बढ़ा रहा है और भारत लगभग 200 देशों को किसी न किसी उत्पाद का निर्यात करता है।

अतः इन बाजारों में उत्पादों और सेवाओं के निर्यात को बढ़ाने के लिए नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। इस दिशा में एक अप्रैल से लागू किए जाने वाले चार नए श्रम कानून मील का पत्थर साबित हो सकते हैं। यदि इनका बेहतर तरीके से क्रियान्वयन किया गया तो भारत सेवा क्षेत्र के साथ-साथ मैन्यूफैक्चरिंग का हब बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है। भारत ने निर्यातकों को सहारा देने के लिए जो नई रणनीति बनाई है, उसके तहत निर्यात बढ़ाने के उद्देश्य से 40 देशों में विशेष संपर्क कार्यक्रम चलाने की योजना है। इस पहल में ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, नीदरलैंड, पोलैंड, कनाडा, मेक्सिको, रूस, बेल्जियम, तुर्किये, यूएई और आस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख देशों को शामिल किया गया है।

इसके साथ ही केंद्र सरकार ने निर्यात बढ़ाने के लिए 4,531 करोड़ रुपये की नई मार्केट एक्सेस सपोर्ट योजना भी घोषित की है। हालांकि निर्यात को गति देने के लिए केवल बाजार तक पहुंच ही नहीं, बल्कि संरचनात्मक सुधार भी अनिवार्य हैं। निर्यातकों की समस्याएं केवल शुल्क वृद्धि तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन पर लगाए गए एंटी-डंपिंग शुल्क भी एक बड़ी चुनौती हैं। ऋण स्थगन की सुविधा को वित्त वर्ष 2026-27 तक बढ़ाया जाना निर्यातकों के लिए लाभकारी होगा।

इसके अलावा निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए सभी राज्यों में मान्यता प्राप्त आधुनिक प्रयोगशालाओं की स्थापना भी जरूरी है, जिससे लागत और समय की बचत के साथ लाजिस्टिक बाधाएं कम होंगी। साथ ही बाजार तक पहुंच के लिए सहयोग, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, विश्वसनीय कच्चा माल, कम ऊर्जा लागत, मजबूत बुनियादी ढांचा और नियामकीय समन्वय भी आवश्यक है। रिजर्व बैंक को भी अमेरिकी शुल्कों से प्रभावित निर्यातकों को राहत देने के लिए उपयुक्त पहल करनी होगी।

Post a Comment

Previous Post Next Post