• रवि उपाध्याय
इंदौर में जन्मे अमरजीत गिल ने लगभग 12000 किलोमीटर दूर स्थित कनाडा में ईमानदारी और नैतिकता की मर्यादा की जो मिसाल कायम की है उसने 1966 में अटल बिहारी बाजपेई द्वारा भारतीय संसद में दिए गए ऐतिहासिक भाषण की याद दिला दी है। अमरजीत गिल द्वारा उठाए गए इस कदम ने इंदौर ही नहीं इंदौर के साथ पूरे देश का मस्तक ऊंचा कर दिया है। उनका यह कदम कट्टर ईमानदार होने का दावा करने वाले सियासी नेताओं के लिए भी एक सबक है।
बता दें कि अमरजीत गिल अप्रैल 2025 में कनाडा में हुए वहां की संसद हाउस ऑफ़ कॉमन्स के चुनावों में सांसद चुने गए हैं। उन्होंने उक्त चुनाव में कनाडा के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री कमल खेड़ा को पराजित किया था। गिल टोरंटो के ब्रैंपटन वेस्ट से कनाडा के प्रमुख विरोधी दल कंजर्वेटिव पार्टी से सांसद चुने गए हैं।
बताया जा रहा है कि अमरजीत गिल को कनाडा की अल्पमत वाली सत्तारूढ़ पार्टी लिबरल पार्टी में शामिल होने के लिए करोड़ों डॉलर का प्रलोभन दिया गया, परंतु उन्होंने अपना ज़मीर बेचने और मतदाताओं के प्रति भरोसे के साथ छल करने से इनकार कर के राजनीतिक मूल्यों को प्राथमिकता दी ।
बता दें कि कनाडा में मौजूदा प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की लिबरल पार्टी अल्पमत में है। उसे बहुमत पाने के लिए कुछ सांसदों की जरूरत है। मार्क कोर्नी पर आरोप है कि वह बहुमत के लिए ऑपोजिशन से सांसदों की खरीदने का प्रयास कर रहे हैं। कनाडा में सांसदों के खरीद फ़रोख्त की चर्चाओं ने हमारे देश की राजनीति दृश्य की याद दिला दी है। लेकिन अमरजीत गिल ने जिस तरह करोड़ों डॉलर के ऑफर को नकारा है वह आज की अंधेरी सियासत में शुचिता और मर्यादा के जलते हुए दीपक के समान है।
इंदौर के मूल निवासी अमरजीत गिल द्वारा इंदौर से करीब 12000 किमी दूर सात समंदर पार, कनाडा में उठाए गए इस कदम ने सन् 1966 में भारत की संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के भाषण की याद दिला दी ।
यह घटना सन् 1966 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद तब की है जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई की सरकार अल्पमत में थी। लोकसभा के चुनावों में भाजपा 161 सांसदों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में आई थी। अटल जी ने 16 मई 1996 को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी। संसद में बहुमत साबित नहीं कर पाने के बाद अटल बिहारी बाजपेई ने 1 जून 1996 को राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया था।
इस्तीफा देने से पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई ने अपने ऐतिहासिक भाषण में सत्ता के लिए सांसदों की खरीद फ़रोख्त को पाप बताया था। उन्होंने सदन में दृढ़ता से कहा था कि वे ऐसी सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा जो खरीद फ़रोख्त कर के बनी हो। अटल जी के इन्हीं सिद्धांतों और उसूलों की सुखद झलक सात समंदर पार इंदौर के अमरजीत गिल द्वारा कनाडा में दिखाई दी है।
बता दें कि कनाडा के 343 सदस्यीय हाउस ऑफ़ कॉमन्स में बहुमत का आंकड़ा 172 है। लिबरल पार्टी के पास कंजर्वेटिव पार्टी से दल बदल कर आए सांसदों के बाद 170 सांसद है। यह संख्या सामान्य बहुमत से 02 कम है। इसीलिए सांसदों के खरीद फ़रोख्त के प्रयास किए जा रहे हैं। इन्हीं प्रयासों के तहत पिछले साल के अंत में कंजर्वेटिव पार्टी के दो सांसद टूट कर लिबरल पार्टी में शामिल हो गए थे।
अमरजीत गिल के अलावा एक और कंजर्वेटिव सांसद स्कॉट एंडरसन ने सरकार की खरीद फ़रोख्त की नीति की सख्त आलोचना की है। उन्होंने कहा कि मैं अपने मतदाताओं को धोखा देने का सोचूंगा भी नहीं। आपको मुझ से पूछना बंद कर देना चाहिए। आप जितनी बार भी मुझे ऑफर देंगे मैं हर बार उसे सार्वजनिक कर दूंगा।
हमारे जन प्रतिनिधियों को सीख
अमरजीत गिल और स्कॉट एंडरसन की इन घटनाओं से उम्मीद है कि हमारे नेता इससे कुछ सबक लेंगे और लोकतंत्र को कलंकित करने से बचेंगे। दिल्ली में विधानसभा चुनावों के बाद हम सत्तारूढ़ दल के प्रमुख नेता अनेकों बार विपक्ष पर आरोप लगा चुके हैं कि उनके विधायकों को खरीदने के 20 करोड़ रुपए के ऑफर दिए जा रहे हैं और उनके पास इसकी मोबाइल पर रिकॉर्डिंग भी मौजूद है और समय आने पर उसे सार्वजनिक किया जाएगा। लेकिन 10 सालों के बाद भी दिल्ली की सत्ता गंवाने के बाद भी वह उक्त कथित खरीद फ़रोख्त के ऑफर को सार्वजनिक नहीं कर सके। इस पार्टी ने ऐसे ही आरोप पंजाब और गुजरात में अपने विधायकों के लिए भी लगाए पर वे इन्हें प्रमाणित नहीं कर सके। राजनीति को कलंकित करने वाले इन हथकंडों से बचना चाहिए।
( लेखक राजनैतिक समीक्षक एवं एक व्यंग्यकार भी हैं। )
18012026

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