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सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा बंगाल में 58 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से कैसे कटे?The Supreme Court asked the Election Commission how the names of 58 lakh people were removed from the voter list in Bengal?

 

मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया के तहत पश्चिम बंगाल में 58 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं। इस पर राज्य की सत्ताधारी पार्टी टीएमसी ने घोर आपत्ति उठाई है। टीएमसी ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस पर न्यायालय ने साफ कहा है कि चुनाव आयोग ने इतनी बड़ी संख्या में लोगों के नाम कैसे काट दिए। इस पर एक हफ्ते के भीतर जवाब दें। याचिका पर सोमवार को सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को कड़ी फटकार लगाई और एक सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने इस मामले को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता की एक बड़ी चुनौती करार दिया है।


सांसद डोला सेन द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि निर्वाचन आयोग ने विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) के दौरान वैध दस्तावेजों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से लाखों मतदाताओं के नाम अवैध रूप से हटा दिए गए। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत में दलील दी कि चुनाव आयोग जमीनी स्तर के अधिकारियों को व्हाट्सऐप मैसेज और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मौखिक निर्देश दे रहा है, जो पूरी तरह से असंवैधानिक और गलत है। सिब्बल ने मांग की कि मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सभी निर्देश लिखित रूप में होने चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जोयमल्या बागची की पीठ ने निर्वाचन आयोग के वकील को सख्त निर्देश दिए कि वे शनिवार तक अपना पक्ष स्पष्ट करें। मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई 19 जनवरी को तय की गई है। डोला सेन ने कोर्ट से 15 जनवरी की समयसीमा को आगे बढ़ाने की भी गुहार लगाई है, जो दावों और आपत्तियों को दर्ज करने की अंतिम तारीख है। याचिका में यह भी स्पष्ट किया गया है कि पश्चिम बंगाल में 16 दिसंबर को प्रकाशित ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल में 58 लाख से अधिक नाम काट दिए गए। 

आरोप है कि यह कार्रवाई बिना किसी व्यक्तिगत सुनवाई या पूर्व नोटिस के की गई है, जिससे वोटर्स की कुल संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ रह गई है। याचिका में मांग की गई है कि पंचायत निवास प्रमाण पत्र, परिवार रजिस्टर और स्थायी निवास प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेजों को वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के लिए वैध माना जाए। याचिकाकर्ता को आशंका है कि दोषपूर्ण फाइनल रोल के तुरंत बाद बंगाल विधानसभा चुनाव की घोषणा हो सकती है, जिससे लाखों योग्य मतदाता अपने मताधिकार से वंचित रह जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने अब आयोग से इस पूरी प्रक्रिया और विसंगतियों पर स्पष्टीकरण मांगा है।

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