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कलेक्टर साहब पर भारी पड़ी रासुका की कार्रवाई, हाईकोर्ट ने लगाया 2 लाख का अर्थदंड The National Security Act proceedings backfired on the Collector; the High Court imposed a fine of 2 lakh rupees.

टाइपिंग एरर से निर्दोष की स्वतंत्रता छीनी

- बालू माफिया के खिलाफ आवाज उठाने वाले को मिली राहत

- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का कलेक्टर के खिलाफ फैसला

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रशासनिक लापरवाही और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के दुरुपयोग के एक बेहद चौंकाने वाले मामले में ऐतिहासिक कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने शहडोल कलेक्टर डॉ. केदार सिंह पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है, जिसे उन्हें अपने निजी वेतन से जमा करना होगा। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की डबल बेंच ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कलेक्टर की कार्यप्रणाली की तुलना महाभारत की गांधारी से करते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे कलेक्टर आंखों पर पट्टी बांधकर काम कर रहे हैं।



-बालू माफिया का विरोध करने पर निर्दोष को मिली सजा

​पूरा मामला शहडोल जिले की व्यवहारी तहसील के बुढ़वा गांव का है। यहां के निवासी सुशांत सिंह बैस, जो खेती और मटेरियल सप्लाई का काम करते हैं, अपने क्षेत्र में हो रहे अवैध बालू उत्खनन के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। उन्होंने स्थानीय स्तर पर आंदोलन किए और कई शिकायतें दर्ज कराईं। सुशांत की सक्रियता बालू माफिया को खटकने लगी, जिसके बाद साजिश के तहत उनके खिलाफ चोरी और मारपीट के फर्जी मामले दर्ज कराए गए। हद तो तब हो गई जब शहडोल पुलिस प्रशासन के प्रस्ताव पर कलेक्टर ने बिना किसी जांच-परख के सुशांत पर रासुका जैसी गंभीर धारा लगा दी। इस आदेश के बाद सुशांत को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

-कलेक्टर का तर्क: टाइपिंग की गलती से निर्दोष गया जेल

​सुशांत के पिता हीरामणि बैस ने हाईकोर्ट में इस गिरफ्तारी को चुनौती दी। मामले की सुनवाई के दौरान जो तथ्य सामने आए, उन्होंने कोर्ट को हैरान कर दिया। कलेक्टर डॉ. केदार सिंह ने स्वीकार किया कि कलेक्ट्रेट के बाबू ने टाइपिंग की गलती की थी। दरअसल, रासुका की कार्रवाई नीरज कांत द्विवेदी नाम के किसी अन्य अपराधी पर होनी थी, लेकिन बाबू ने गलती से सुशांत बैस का नाम लिख दिया। एडवोकेट ब्रह्मेन्द्र पाठक ने कोर्ट में दलील दी कि कलेक्टर ने न तो स्वतंत्र गवाहों के बयान लिए और न ही फाइल का उचित अध्ययन किया। कोर्ट ने इसे बुद्धि का प्रयोग न करना करार देते हुए कहा कि एक प्रशासनिक अधिकारी का ऐसा व्यवहार किसी निजी कंपनी के कर्मचारी जैसा प्रतीत होता है, जो बस दबाव में काम कर रहा है।

-एक साल का कारावास और फैसला

​हालांकि सुनवाई पूरी होने तक सुशांत एक साल से ज्यादा का वक्त जेल में गुजार चुके थे, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सजा पूरी होने का मतलब यह नहीं कि आरोप सही थे। हाईकोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि कैसे एक टाइपिंग एरर की वजह से किसी निर्दोष की स्वतंत्रता छीन ली गई।

-क्या है कोर्ट का आदेश

​कोर्ट ने आदेश दिया है कि ​कलेक्टर 30 दिनों के भीतर 2 लाख रुपये जुर्माना अपनी निजी जेब से भरें। ​यह राशि पीड़ित सुशांत सिंह बैस के खाते में मुआवजे के तौर पर जमा की जाए। ​कोर्ट ने कलेक्टर को अवमानना का नोटिस भी जारी किया है।

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