● रवि उपाध्याय
बांग्लादेश में जिस तरह 27 साल के युवक दीपू चंद्र दास की पीट पीट कर हत्या करने के बाद दुर्दांत मुस्लिम दहशतगर्दों द्वारा जिस तरह उसकी लाश को पेड़ पर लटकाने के बाद भी न केवल लाठियों से पीटा गया बल्कि पेड़ पर टंगे शव को आग के हवाले कर दिया गया। यह घटना अत्यंत निंदनीय और बर्बरता की गवाह है। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं। महिलाओं से बलात्कार किए जा रहे हैं। मंदिरों को जलाया जा रहा है। भारतीय उच्चायोग पर हमले के प्रयास किए जा रहे हैं।
यह खौफ़नाक दृश्य है उस देश का जिस देश को आजाद कराने में भारतीयों ने अपना खून बहाया । उसी देश के कट्टर पंथी नमक हरामी कर रहे हैं। वह बर्बरता पर उतर कर इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं या उसकी असलियत बता रहे हैं। यह समझ से परे और दुखद है। इसकी देश के सभी वर्गों द्वारा भर्त्सना की जानी चाहिए।
यह कैसी गंगा जमुनी तहजीब
परंतु अफसोस कि देश में खुद को धर्म निरपेक्ष होने का दावा करने वाले सियासी दल अपना मुंह सिल कर बैठे है। जो मुस्लिम धर्मगुरु इस्लाम को अमन और भाईचारा का मजहब बताते नहीं थकते हैं। जो गंगा जमुनी तहजीब की जुमला बार बार दोहराते हैं वो हजारों मिल दूर स्थित गाजा पट्टी पर इजरायल के हमलों के खिलाफ पर बड़े बड़े जुलूस निकालते हैं किन्तु वे बांग्लादेश के इस्लामिक आतंकवादियों के खिलाफ न केवल चुप बैठे हैं बल्कि वह झूठ बोल कर उन्हें जस्टिफाई कर रहे हैं कि भारत में भी यही मुस्लिमों के खिलाफ हो रहा है। यह मक्कारी नहीं तो और क्या कहा जाए। ऐसा ही रुख इन अमन के फरिश्तों ने कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के समय अपनाया था। कांग्रेस के बड़े नेता राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह का बयान इस विषय पर कांग्रेस पार्टी की नीति को स्पष्ट कर रहा है।पार्टी का यह कदम आत्मघाती साबित होगा। कांग्रेस के एक अन्य मुस्लिम नेता रशीद अल्वी ने भी दिग्विजय का समर्थन ही किया है।
भारत को क्या मिला
इन दिनों बांग्लादेश में की जा रही हिंदुओं की हत्याएं, उनके घरों, मंदिरों को जलाए जाने की घटनाओं से हमारे मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि 1971 में बांग्लादेश को बनवाने में हमारे द्वारा मदद करना का फायदा हमारे देश को आखिर क्या मिला? हमारे क़रीब 4000 जवानों की शहादत से क्या हम अपने पड़ोसी बांग्लादेश को अमन और पंथ निरपेक्ष देश बनाने में सफल रहे। इसका उत्तर है बिल्कुल नहीं उलटे इससे हमें नुकसान ही हुआ। इसकी सजा हम पचास साल बाद आज तक भुगत रहे हैं।सामाजिक भी आर्थिक तौर से भी और भौगोलिक स्तर पर भी। वहां से हमारे यहां आतंकी भी शरणार्थी के रुप में आते रहे और हम मानवता और इंसानियत की माला जपते रहे।
भले ही आप को यह आलेख और उसका विषय आपको नागवार लगे। लेकिन यह एक ज्वलन्त सवाल है कि बांग्ला देश को स्वतंत्र कराने में भारत के जवानों ने बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी के लोगों का साथ दिया था और उन्हें तत्कालीन पाकिस्तान सेना के जुल्मों सितम से मुक्त करा कर एक स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष एवं सम्प्रभु बांग्ला देश बनाने में मदद की थी। 9 महीने तक चले बांग्ला मुक्ति संग्राम के इस संघर्ष में भारतीय सेना के 3864 जवानों ने भी अपने प्राणों का बलिदान कर वहां की बांग्ला भाषी अवाम को आतातायी पाक सेना के जुल्मों सितम से आज़ाद कराया था। तब वहां की अवाम ने मुक्तिवाहिनी के सफल नेतृत्व कर्ता बंगबंधु शेख मुजीब उर रहमान को बांग्लादेश का पहला राष्ट्रपति बनाया गया। लेकिन बांग्लादेश के गठन के महज 4 साल बाद ही 1975 में एक सैन्य विद्रोह के बाद 15 अगस्त 1975 की सुबह वहां के राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या कर दी गई।
1971 में 9 माह तक चले मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान की फौज द्वारा 10 लाख औरतों के साथ दुष्कर्म किया गया था। इसी संघर्ष में 30 लाख पूर्वी बंगाल के नागरिक मारे गए थे।
बांग्लादेश निर्माण की पृष्ठभूमि
जैसा कि ऊपर की पंक्तियों में बताया गया है कि बांग्लादेश बनने से पहले यह भूभाग पाकिस्तान का एक हिस्सा था। 1970 में पाकिस्तान में नेशनल एसेंबली के चुनाव हुए। पूर्वी पाकिस्तान की आवामी लीग को बहुमत मिला। इस के नेता शेख मुजीबुर्रहमान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाना था परन्तु राष्ट्रपति जनरल याह्या खान ने उनको जेल में डाल दिया। इसके खिलाफ पूर्वी पाक में विरोध प्रदर्शन हुए। पाकिस्तान की सेना ने वहां बंगालियों पर अत्याचार शुरु कर दिए।महिलाओं से बलात्कार, लूटपाट औरआगजनी हत्याएं की गईं।30 लाख बंगालियों को मार दिया गया। वहां से करीब 1 करोड़ से ज्यादा पीड़ित बंगाली भाग कर भारत आए। इसके परिणाम स्वरूप भारत पर आर्थिक दबाव आने लगा तब भारत की सेना ने मुक्ति वाहिनी की अपील करने पर हस्तक्षेप किया।
यह बात सन 1970-71 की है। उस समय भारत की प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी थीं। बांग्लादेश बनने के पहले वर्तमान बांग्लादेश का भू-भाग 1947 में भारत से अलग हो कर बने पाकिस्तान का हिस्सा था। इसे पूर्वी पाकिस्तान कहा गया और दूसरे हिस्से को पश्चिमी पाकिस्तान कहा जाता था। कल का पूर्वी पाकिस्तान आज का वह बांग्लादेश है जहां कट्टरपंथियों द्वारा गैर मुस्लिमों का कत्लेआम किया जा रहा है। गैर मुस्लिमों के उपासना स्थलों को जलाया जा रहा है, उन्हें नष्ट किया जा रहा है। दुनिया के नक्शे पर भले ही पूर्वी पाकिस्तान का नाम बदल कर बांग्ला देश हो गया है पर उनमें गैर मुस्लिमों के प्रति हिंसा,दरिंदगी और नफरत 1947 में बंटवारे के समय की गई हिंदुओं के प्रति नफरत, हिंसा और आगजनी और बलात्कारों की घटनाएं आज भी यथावत उसी तरह जारी हैं।
भारत आए 1 करोड़ शरणार्थी
बांग्ला मुक्ति संग्राम में भारत में करीब 10 मिलियन (एक करोड़) भारत आए थे। भारत ने मानवीय आधार पर इनके रहने खाने की व्यवस्था की। उस समय इन शरणार्थियों को असम, पश्चिम बंगाल, बिहार सहित अन्य राज्यों में बसाए गए थे। इसका बड़ा असर भारत की अर्थ व्यवस्था पर पड़ा था। इसके लिए भारत में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार ने आम आदमी पर कर लगाया था।
बांग्ला देश मुक्ति वाहिनी के क़रीब 9 माह तक चले इस संघर्ष के बाद 16 अगस्त 1971 को पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह जनरल याह्या खान की 93 हज़ार से अधिक पाकिस्तानी फौजियों ने जनरल आमिर अब्दुल्ला खान नियाज़ी के नेतृत्व में भारतीय सेना के मेजर जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष हथियार डाल कर आत्मसमर्पण कर दिया था।
अर्थव्यवस्था पर असर
बांग्लादेश से भारत आए शरणार्थियों की वजह से भारत पर अनावश्यक भार पड़ा। यहां आए 1 करोड़ से अधिक रिफ्यूजी में से कुछ ही भारत से वापस गए। जबकि लाखों शरणार्थी भारत में ही रह गए। इसके बाद वहां से अवैध घुस पैठ जारी रही।
बांग्लादेश में मुक्ति संग्राम के सात वर्ष पहले भी 1964 में पूर्वी पाकिस्तान से 20 लाख अवैध घुसपैठिए भारत में घुसे।
पाकिस्तान द्वारा हमला
जब भारत बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी को मदद कर रहा था तब पाकिस्तान ने 1971 के दिसंबर माह में भारत के हवाई अड्डों पर हमला किया था। भारत ने इसे खुला युद्ध माना और मुक्ति वाहिनी के संघर्ष की सहायता की। परिणाम स्वरूप यह युद्ध 13 दिनों तक चला और 16, दिसंबर 1971 को दुनिया के नक्शे पर एक नए देश के रूप में बांग्लादेश का उदय हुआ। शेख मुजीबुर्रहमान को वहां का प्रधानमंत्री बनाया गया।
कट्टरपंथियों की नाराजी
बांग्ला देश के गठन से वहां मौजूद पाक समर्थित कट्टरपंथियों को यह पसंद नहीं आया और वहां हिंसक घटनाएं बंगाली हिंदुओं पर हमले गैर मुस्लिम उपासना स्थलों पर हमले, आगजनी तोडफ़ोड़ चलता रहा। इसके साथ ही भारत की सीमा में बांग्लादेश से घुसपैठ का क्रम जारी रहा। इसके साथ ही म्यांमार से बांग्लादेश आने वाले रोहिंग्याई घुसपैठिए भी वहां से भेजे जाने लगे। बांग्लादेश में बैठे कट्टरपंथियों का यह कदम यहां के सीमांचल प्रदेशों में रणनीतिक रूप से मुस्लिमों को भेजना था। भारत की खुली बॉर्डर का उन्होंने फायदा मिला।
वर्तमान में 5 करोड़ घुसपैठ
एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में देश में करीब 5 करोड़ घुसपैठिए होने का अनुमान है। सरकार ने इस बारे में कोई अधिकृत आंकड़े तो जारी नहीं किए गए हैं लेकिन 2004 में गृह राज्य मंत्री प्रकाश जायसवाल ने लोकसभा में 12 मिलियन यानी 1.20 करोड़ अवैध घुसपैठियों की जानकारी दी थी। 2016 में तत्कालीन गृहराज्य मंत्री किरण रिजिजु ने देश में 20 मिलियन यानि 2 करोड़ अवैध घुसपैठिए होने की बात सदन में बताई थी। 2016 के 9 सालों के बाद हो रही अवैध घुसपैठ को देखते हुए निश्चित रूप से यह आबादी निश्चित रूप से बढ़ कर 5 करोड़ का अनुमान अजूबा नहीं कहा जा सकता है।
पाकिस्तान का कब्जा
कहने को बांग्लादेश खुद को सार्वभौमिक एवं संप्रभु राष्ट्र कहता हो लेकिन यह एक सच्चाई है कि बांग्लादेश पाकिस्तान और वहां के फील्ड मार्शल असीम मुनीर और बांग्लादेश में रह रहे इस्लामी कट्टरपंथी जमातों की कठपुतली सरकार बन कर रह गई है। असीम मुनीर बांग्लादेश के सलाहकार मुहम्मद यूसुफ को इस्लाम के नाम पर भारत के भारत के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार इसी सिलसिले में कई बार ढाका की यात्रा कर चुके हैं। हाल ही में पाकिस्तान ने धमकी दी है कि बांग्लादेश पर हमला पाकिस्तान के खिलाफ हमला माना जाएगा।
भारत को धोखा मिला
1971 में जब पाकिस्तान की फौजें पूर्वी पाकिस्तान में रहने वाले बंगाली मुस्लिमों को अपने बूटों तले कुचल रहीं थीं। वहां हत्याएं बलात्कार कर रहीं थीं तब वहां की मुक्ति वाहिनी ने भारत से मदद मांगी जिस पर भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मानवता दिखाते हुए उनकी मदद कर उसे पाकिस्तान के आतंक पर मुक्ति दिलाई थी। लेकिन वहां के कट्टरपंथी इससे खुश नहीं थे। उन्होंने बांग्लादेश को बनाने वाले राष्ट्रपति बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान को देश के गठन के चार साल बाद ही 15 अगस्त 1975 को उस समय मौत के घाट उतार दिया जब दिल्ली में इंदिरा गांधी लालकिले की प्राचीर पर तिरंगा फहरा रहीं थीं।
भारत को मिले बम धमाके
पाकिस्तान के दो टुकड़े होने से वहां की सरकार चुप नहीं बैठी। उसने भारत में आतंकी भेजने की तैयारी शुरू कर दी। इसकी परिणिति 1990 में जम्मू कश्मीर में दहशतगर्दी, कश्मीरी पंडितों की हत्याएं हिन्दू, महिलाओं से बलात्कार सरहदों पर लगातार आक्रमण। भारत के राज्यों में सीरियल बम ब्लास्ट, विमान अपहरण, कारगिल हमला मुंबई का 26 नवम्बर 2008 का होटल ताज का हमला। हमारे पंजाब राज्य में खालिस्तानी आंदोलन को हवा देना चलता रहा। यही नही असम,मेघालय, सिक्किम ,त्रिपुरा,अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर और मिजोरम राज्यों को जोड़ने वाले चिकन नेक कारीडोर को कटाने का सपना संजोया।
संसद भवन पर हमला भी पाकिस्तान की साजिश का ही हिस्सा था।
ग्रेटर बंगाल का सपना
बांग्लादेश की जमात ए इस्लामी पार्टी और पाकिस्तान का यह षड्यंत्र है कि बांग्ला देश की सीमा पर स्थित 24 किलो मीटर चौड़े चिकन नेक, जिसे सिलीगुड़ी कारीडोर भी कहते हैं उस पर कब्जा कर लिया जाए। यह रास्ता कट जाने के बाद भारत की असम मेघालय सिक्किम त्रिपुरा अरुणाचल प्रदेश नगालैंड मणिपुर मिजोरम का रास्ता बंद कर उसे ग्रेटर बंगाल में शामिल कर नया देश बना दिया जाए। इसमें पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बाहुल्य को भी शामिल करने का मंसूबा पाकिस्तान पाले हुए है।
पाकिस्तान के इस मंसूबे में चीन और अमेरिका का गुप्त समर्थन प्राप्त है। इन देशों का मुख्य उद्देश्य भारत को कमजोर करना है। वहीं पाकिस्तान भारत से पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बनाने का बदला लेना चाहता है। इस साज़िश में पाकिस्तान और मुस्लिम कट्टरपंथी जमातों को कुछ मुस्लिम राष्ट्रों का भी समर्थन प्राप्त है।
जातियों में बांटना
बांग्लादेश के गठन के बाद से ही पाकिस्तान ने यह तय किया कि भारत में जातिवाद को बढ़ावा दिया जाए ताकि इसे सामाजिक रूप से कमजोर किया जा सके। दूसरे देश में डेमोग्राफी को बदलने के लिए बांग्लादेश से बंगाली और म्यांमार से बांग्लादेश आने वाले रोहिंग्याई घुसपैठियों को पश्चिम बंगाल राज्य की खुली बॉर्डर का लाभ उठा कर उन्हें पश्चिम बंगाल, असम मेघालय और त्रिपुरा भेजा गया। यहां उनके आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर कार्ड बनवाए गए। इन राज्यों में रह रहे मुस्लिमों ने इस कार्य में उनकी मदद की।
भारत सरकार सतर्क
ऐसा नहीं है कि भारत सरकार इन सब साजिशों से बेखबर है। वह इस दिशा में पेशबंदी कर रही है। लेकिन सियासी परिस्थितियां बहुत ही पेचीदा है। घुसपैठियों के समर्थन में एक बड़ी सियासी जमात है। जो इनके समर्थन में मानव अधिकारों की आड़ में ढाल बन कर खड़ी हो जाती है। बार बार अदालतों के दरवाजे खटखटाए जाते हैं। इस साज़िश को बेनकाब करने की केवल एक ही दवा है इनका कानूनी और सामाजिक विरोध। देश को घुसपैठियों से मुक्त करना जरूरी है वरना या देश की सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा !

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