प्रयागराज। क्या किसी दूसरे धर्म को अपनाते ही व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति यानी ST दर्जा खत्म हो जाता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस सवाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी व्यक्ति का ST दर्जा अपने आप समाप्त नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि असली सवाल यह है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी व्यक्ति अपनी जनजातीय पहचान और समुदाय से जुड़ा रहा या नहीं।
जस्टिस अरुण कुमार की पीठ ने नन्हकी उर्फ नईमुन्निसा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में यह टिप्पणी की। मामला भुइयां अनुसूचित जनजाति से संबंधित महिला के भूमि हस्तांतरण से जुड़ा था। महिला ने मुस्लिम व्यक्ति से विवाह किया था और लंबे समय तक मुस्लिम सामाजिक एवं धार्मिक माहौल में रही। परिवार रजिस्टर में भी उसका धर्म मुस्लिम दर्ज था। राज्य ने इसी आधार पर उसके ST दर्जे पर सवाल उठाया था।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के चिंथडा आनंद फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ST दर्जे के निर्धारण में पारंपरिक रीति-रिवाज, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और संबंधित जनजाति द्वारा स्वीकार्यता जैसे पहलू महत्वपूर्ण हैं। केवल किसी दस्तावेज में व्यक्ति का धर्म दर्ज होना निर्णायक नहीं हो सकता।
हालांकि इस मामले में अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता कई दशकों तक भुइयां समुदाय से अपना निरंतर जुड़ाव, उसके रीति-रिवाजों का पालन और समुदाय की स्वीकार्यता साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस साक्ष्य नहीं दे सकीं। इसलिए अदालत ने राजस्व अधिकारियों के आदेश बरकरार रखते हुए याचिकाएं खारिज कर दीं।

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