नई दिल्ली। एक ही मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी ने वैश्विक कूटनीति का ध्यान भारत की ओर खींच दिया है। ब्रिक्स के मंच पर तीन बड़ी शक्तियों का यह साथ केवल तस्वीर तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसके पीछे बदलती वैश्विक राजनीति, व्यापार, सुरक्षा और पश्चिमी प्रभाव के बीच नई रणनीतिक समीकरणों की संभावना भी देखी जा रही है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि रूस और चीन के साथ संबंधों को आगे बढ़ाते हुए अमेरिका और यूरोप के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को भी संतुलित रखा जाए। रूस भारत का प्रमुख रक्षा और ऊर्जा साझेदार रहा है, जबकि चीन के साथ सीमा विवाद और व्यापार असंतुलन जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं।
दूसरी तरफ रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव में नए आर्थिक और कूटनीतिक साझेदार तलाश रहा है। चीन वैश्विक व्यापार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में ब्रिक्स उनके लिए भी महत्वपूर्ण मंच बन गया है।
क्या बदल सकता है?
अगर इन देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था, ऊर्जा सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर ठोस सहमति बनती है, तो इसका असर मौजूदा वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पर पड़ सकता है।
लेकिन सिर्फ एक मंच पर तीन नेताओं की मुलाकात को नए विश्व क्रम की शुरुआत मान लेना जल्दबाजी होगी। असली परीक्षा घोषणाओं के बजाय ठोस फैसलों और उनके अमल की होगी।
यही वजह है कि मोदी-पुतिन-शी की यह तस्वीर जितनी प्रतीकात्मक है, उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण इसके पीछे होने वाली बातचीत और उससे निकलने वाले परिणाम होंगे।
दुनिया का सबसे बड़ा ‘हैंडशेक’! मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग एक साथ; क्या बदलेगा ग्लोबल वर्ल्ड ऑर्डर?
नई दिल्ली। एक ही मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी ने वैश्विक कूटनीति का ध्यान भारत की ओर खींच दिया है। ब्रिक्स के मंच पर तीन बड़ी शक्तियों का यह साथ केवल तस्वीर तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसके पीछे बदलती वैश्विक राजनीति, व्यापार, सुरक्षा और पश्चिमी प्रभाव के बीच नई रणनीतिक समीकरणों की संभावना भी देखी जा रही है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि रूस और चीन के साथ संबंधों को आगे बढ़ाते हुए अमेरिका और यूरोप के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को भी संतुलित रखा जाए। रूस भारत का प्रमुख रक्षा और ऊर्जा साझेदार रहा है, जबकि चीन के साथ सीमा विवाद और व्यापार असंतुलन जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं।
दूसरी तरफ रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव में नए आर्थिक और कूटनीतिक साझेदार तलाश रहा है। चीन वैश्विक व्यापार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में ब्रिक्स उनके लिए भी महत्वपूर्ण मंच बन गया है।
क्या बदल सकता है?
अगर इन देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था, ऊर्जा सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर ठोस सहमति बनती है, तो इसका असर मौजूदा वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पर पड़ सकता है।
लेकिन सिर्फ एक मंच पर तीन नेताओं की मुलाकात को नए विश्व क्रम की शुरुआत मान लेना जल्दबाजी होगी। असली परीक्षा घोषणाओं के बजाय ठोस फैसलों और उनके अमल की होगी।
यही वजह है कि मोदी-पुतिन-शी की यह तस्वीर जितनी प्रतीकात्मक है, उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण इसके पीछे होने वाली बातचीत और उससे निकलने वाले परिणाम होंगे।

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