प्रणव बजाज
उज्जैन में खड़े हनुमान मंदिर को सड़क चौड़ीकरण की राह में बाधा मानकर हटाने की कोशिश ने एक बार फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है—मोहन सरकार के लिए विकास का मतलब आखिर क्या है? क्या सड़क कुछ फीट चौड़ी करने के लिए आस्था सदियों पीछे धकेल दी जाएगी? क्या हर पुराना मंदिर, मकान और बाजार अब सरकारी नक्शे की एक लाइन से मिटा दिया जाएगा?
यह पहली बार नहीं है जब मोहन सरकार की विकास शैली पर सवाल उठे हैं। महाकाल लोक के निर्माण के बाद सामने आई मूर्तियों के टूटने की घटना हो, उज्जैन में सिंहस्थ की तैयारियों के नाम पर जमीन और अतिक्रमण को लेकर उठते विवाद हों, इंदौर में पुराने मकानों और धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई हो या खजराना जैसे आस्था केंद्रों के आसपास किए गए बदलाव—हर जगह सरकार के सामने एक ही चुनौती है: विकास और विरासत के बीच संतुलन।
महाकाल की नगरी में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिंहस्थ 2028 की तैयारी के नाम पर प्रशासन आखिर किस मॉडल पर शहर बना रहा है? क्या सिंहस्थ भक्तों के लिए होगा या सिर्फ कंक्रीट के नए ढांचे दिखाने के लिए?
और मोहन सरकार को अपने पिछले फैसलों का हिसाब भी देना होगा। हजारों करोड़ की परियोजनाओं के बीच आम आदमी के लिए सड़क, यातायात, सफाई, दर्शन व्यवस्था और पुनर्वास आज भी सवाल क्यों बने हुए हैं? जिस सरकार को मंदिरों की भव्यता पर गर्व है, उसी सरकार के प्रशासनिक फैसलों में मंदिर रास्ते की रुकावट कैसे बन जाते हैं?
खड़े हनुमान के सामने जेसीबी रुक गई—इसे कोई आस्था का संकेत माने या तकनीकी घटना, लेकिन सरकार के लिए इससे बड़ा राजनीतिक संदेश जरूर है: जनता हर सरकारी फैसले को आंख बंद करके स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
मोहन जी, सत्ता स्थायी नहीं होती। कुर्सी आज है, कल नहीं भी हो सकती। लेकिन उज्जैन के मंदिर, गलियां और जनता की स्मृतियां सदियों तक रहेंगी।
अभी भी वक्त है—बुलडोजर की जगह संवाद चुनिए। जिद की जगह विकल्प खोजिए। विकास कीजिए, लेकिन विकास के नाम पर लोगों को मत कुचलिए।
कहीं ऐसा न हो कि जिन आस्थाओं को आप रास्ते का पत्थर समझकर हटाना चाहते हैं, वही आस्थाएं जनता के मन में आपके शासन का सबसे बड़ा सवाल बन जाएं।
बहुत हुआ। अब मोहन सरकार को संभलना होगा। मंदिर बचाइए, विरासत बचाइए, जनता का भरोसा बचाइए—वरना विकास की चमक के नीचे दबे सवाल चुनाव के वक्त सबसे ज्यादा दिखाई देते हैं।
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