संपादकीय: प्रणव बजाज
देश में भ्रष्टाचार की समस्या अब केवल किसी एक विभाग या कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित नहीं रही। यह व्यवस्था के अंदर बैठकर काम करने लगा है—जहाँ नियमों के बजाय “सेटिंग”, पारदर्शिता के बजाय “सौदेबाजी”, और सार्वजनिक हित के बजाय “व्यक्तिगत लाभ” प्राथमिकता बन जाता है। परिणाम यह होता है कि विकास की योजनाएँ कमजोर पड़ती हैं, जरूरतमंदों को उनका हक देर से या नहीं मिलता, और आम नागरिक का विश्वास लगातार टूटता जाता है।
भ्रष्टाचार के रूप भी बदल चुके हैं। पहले जहाँ कमीशन और ठेका-व्यवस्था की सीधी कहानी सुनाई देती थी, वहीं आज फाइलों की गति धीमी कराकर दबाव बनाना, टेंडर की शर्तों में “पूर्व-निर्धारित लाभ” देना, नियमों की आड़ में मनमानी करना, तथा खर्च और भुगतान की प्रक्रिया को अस्पष्ट रखना—ये सब मिलकर भ्रष्टाचार को एक “सिस्टम” का रूप दे चुके हैं। ऐसे में सिर्फ नारे या छापेमारी से काम नहीं चल सकता। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को प्रभावी बनाना है तो प्रक्रिया की संरचना बदलनी होगी।
सबसे जरूरी बात यह है कि भ्रष्टाचार का रास्ता तभी बंद होगा जब पारदर्शिता को प्रशासन की आदत बनाया जाएगा। खरीद, टेंडर, नियुक्ति और फंड-आवंटन से जुड़ी जानकारी खुले और समयबद्ध तरीके से उपलब्ध होनी चाहिए। नागरिक को यह जानने का अधिकार हो कि किस काम के लिए कितना पैसा निकला, किन शर्तों पर ठेका हुआ, और काम की प्रगति कहाँ तक पहुँची। साथ ही, शिकायतों के समाधान की व्यवस्था भी तेज और विश्वसनीय होनी चाहिए, ताकि भ्रष्टाचार करने वाले यह न समझें कि पकड़ बस “औपचारिकता” है।
दूसरी ओर, जवाबदेही का सख्त पालन जरूरी है। भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा सहारा वही सोच होती है जो देरी, लापरवाही और नियमों के उल्लंघन को “सिस्टम की मजबूरी” बताकर बच निकलती है। समय पर फैसले न लेना, फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भुगतान करना, या जांच को टालना—इन सबके लिए जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो, ताकि संदेश साफ जाए कि कानून केवल कहने के लिए नहीं है, उसका असर जमीन पर दिखना चाहिए।
तीसरा, जांच और कार्रवाई का समय-बंधन—यानी “टाइमबाउंड प्रक्रिया”—कड़ाई से लागू होना चाहिए। भ्रष्टाचार अक्सर तब फैलता है जब फाइलें लंबे समय तक धूल खाती हैं और निर्णय मनमाने ढंग से टलते रहते हैं। डिजिटल ट्रैकिंग, स्वतंत्र ऑडिट और निगरानी तंत्र को मजबूत करने से प्रक्रिया की अपारदर्शिता कम होगी। साथ ही, सूचना देने वालों (व्हिसलब्लोअर) के संरक्षण को वास्तविक और प्रभावी बनाना होगा, क्योंकि डर के माहौल में सत्य बाहर नहीं आता।
अंततः, भ्रष्टाचार विरोध केवल सरकार का काम नहीं, पूरे समाज की मांग है। नागरिकों का जागरूक रहना—सूचना माँगना, शिकायत करना, नियमों की पालना पर जोर देना—लोकतंत्र को स्वस्थ बनाता है। लेकिन यह भी सच है कि अंतिम बदलाव तभी आएगा जब राज्य की मशीनरी खुद को ईमानदारी और पारदर्शिता की कसौटी पर खरा साबित करे।
जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई “दिखावे” की नहीं, “व्यवस्था” की हो। जब प्रक्रिया पारदर्शी होगी, जवाबदेही तय होगी, जांच तेज होगी और दोषियों को सजा व रिकवरी निश्चित होगी—तभी भ्रष्टाचार की जड़ कमजोर पड़ेगी। देश को ऐसी ईमानदार शासन-व्यवस्था चाहिए जहाँ योजनाएँ सच में लोगों तक पहुँचें, और मेहनत व ईमानदारी का सम्मान हो।

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