मोहन सरकार से सवाल—जहरीली शराब गांव तक पहुंची कैसे?
प्रणव बजाज
सागर। बंडा क्षेत्र में कथित जहरीली शराब से हुई मौतों ने मध्य प्रदेश की शराब निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार ने अधिकारियों को निलंबित किया, आरोपियों को गिरफ्तार किया और जांच के आदेश दिए हैं। लेकिन मूल सवाल अब भी कायम है—जहरीली शराब लोगों तक पहुंची कैसे और उसे समय रहते रोका क्यों नहीं गया?
मामले में मृतकों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। अंतिम आंकड़ा चिकित्सकीय और प्रशासनिक पुष्टि के बाद ही स्पष्ट होगा।
चेतावनी के बावजूद कार्रवाई में चूक?
इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में संदिग्ध शराब को लेकर आबकारी विभाग के आदेशों और बाद में उनमें हुए बदलाव पर सवाल उठाए गए हैं। यदि जांच में यह घटनाक्रम सही पाया जाता है तो सरकार को स्पष्ट करना होगा कि कार्रवाई के निर्देश क्यों बदले और व्यापक जांच समय रहते क्यों नहीं हुई।
यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक जवाबदेही तय होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री की शराब नीति पर भी उठेंगे सवाल
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और शराब कारोबार से जुड़े उनके पारिवारिक अथवा कारोबारी संबंधों को लेकर सार्वजनिक क्षेत्र में समय-समय पर चर्चाएं और राजनीतिक आरोप सामने आते रहे हैं। लेकिन इन आरोपों को प्रमाण के बिना तथ्य मानना उचित नहीं होगा।
फिर भी सागर कांड के बाद एक वैध सार्वजनिक प्रश्न उठता है—क्या मुख्यमंत्री या उनके परिवार के किसी सदस्य का वर्तमान अथवा पूर्व शराब कारोबार से कोई प्रत्यक्ष व्यावसायिक हित जुड़ा है? यदि है, तो सरकार को उसे स्पष्ट रूप से सार्वजनिक करना चाहिए और यह भी बताना चाहिए कि शराब नीति तथा संबंधित प्रशासनिक निर्णयों में हितों के टकराव से बचने की क्या व्यवस्था है।
सवाल आरोप का नहीं, पारदर्शिता का है।
यदि कोई कारोबारी संबंध नहीं है तो सरकार तथ्य सामने रखकर भ्रम समाप्त कर सकती है। और यदि कोई संबंध है तो उसकी प्रकृति, अवधि और वर्तमान स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
निलंबन से आगे जाएगी जांच?
तीन आबकारी अधिकारियों समेत पुलिस और प्रशासन के स्तर पर कार्रवाई हुई है। लेकिन अवैध शराब की निगरानी केवल स्थानीय निरीक्षक की जिम्मेदारी नहीं होती। इसमें पुलिस, आबकारी विभाग, जिला प्रशासन और खुफिया तंत्र की साझा भूमिका होती है।
इसलिए जांच में पिछले एक वर्ष के निरीक्षण, जब्ती, दर्ज प्रकरण और शिकायतों पर कार्रवाई का पूरा रिकॉर्ड देखा जाना चाहिए।
ललितपुर कनेक्शन की भी जांच जरूरी
जांच में उत्तर प्रदेश के ललितपुर से कथित आपूर्ति का कोण सामने आया है, हालांकि इसे अंतिम तथ्य मानना अभी जल्दबाजी होगी। इसकी स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
उत्पादन से परिवहन और स्थानीय बिक्री तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला, आर्थिक लेन-देन और आरोपियों के संपर्कों की जांच ही वास्तविक नेटवर्क सामने ला सकती है।
असली सवाल
मध्य प्रदेश में जहरीली शराब की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। इसलिए सागर कांड को केवल गिरफ्तारी और निलंबन तक सीमित करना पर्याप्त नहीं होगा।
सरकार को यह बताना होगा कि घटना से पहले क्या सूचना उपलब्ध थी, उस पर किसने निर्णय लिया और क्या कहीं प्रशासनिक लापरवाही हुई।
मौत के बाद निलंबन कार्रवाई है; मौत से पहले खतरे को रोकना सुशासन है।
और मुख्यमंत्री से सबसे सीधा सवाल यही है—
जहरीली शराब किसने बनाई, किसने पहुंचाई और उसे रोकने वाला सरकारी तंत्र समय रहते क्यों नहीं जागा?
यदि शराब कारोबार से जुड़े किसी राजनीतिक या कारोबारी हित का प्रश्न उठता है, तो उसका उत्तर भी आरोप से नहीं, दस्तावेज और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए।

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