प्रणव बजाज
इंदौर। होटल प्राइड से सिटी फॉरेस्ट तक प्रस्तावित 30 मीटर चौड़ी मास्टर प्लान सड़क अब सिर्फ नक्शे की लकीर नहीं रह गई है। करीब 2.40 किलोमीटर लंबी और 29.52 करोड़ रुपए की इस लिंक रोड के रास्ते में आने वाले निर्माणों पर नगर निगम की कार्रवाई जमीन पर उतर चुकी है। 22 अगस्त तक निगम ने 8 बाउंड्रीवाल, 2 आरसीसी स्ट्रक्चर और एक दुकान समेत 11 बाधक निर्माण हटाए हैं।
अब असली परीक्षा उन संपत्तियों की है, जिनके मालिक आम आदमी नहीं, शहर के चर्चित कारोबारी और प्रभावशाली संपत्ति धारक हैं। निगम के नोटिसों में अनंत कुमार केडिया, इंद्रजीत छाबड़ा, मनोज मालपानी, निलेश मालपानी, हिमांशु गीता, अनिल कुमार पाठक, अंशु पति राकेश अग्रवाल, अर्चना गुप्ता, डॉ. सुबोध गुप्ता तथा शालिनी गृह निर्माण संस्था सहित कई नाम सामने आए हैं।
सबसे चर्चित मामला आनंद केडिया का है। उपलब्ध न्यायिक रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त नपती में उनके परिसर के हिस्से पर करीब 12.782 मीटर तक कब्जे का उल्लेख हुआ। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने याचिका खारिज की और 20 हजार रुपए का अर्थदंड लगाया; हालांकि बाद में डबल बेंच में अपील के दौरान बलपूर्वक कार्रवाई पर अंतरिम रोक की जानकारी सामने आई है।
यहां सवाल सिर्फ बुलडोजर चलाने का नहीं है। सवाल यह है कि मास्टर प्लान की सड़क जब गरीब की दीवार से टकराती है तो कार्रवाई तेज होती है, लेकिन रसूखदार की संपत्ति तक पहुंचते-पहुंचते फाइल क्यों भारी हो जाती है?
नगर निगम का दावा है कि कार्रवाई दस्तावेज, सीमांकन और स्वीकृत सड़क सीमा के आधार पर होगी। यही कसौटी अब प्रशासन की भी है—एक ही सड़क, एक ही नियम और एक ही बुलडोजर।
अगर जमीन सरकारी है, निर्माण सड़क की सीमा में है या स्वीकृति नियमों के विपरीत है तो नाम चाहे कितना बड़ा क्यों न हो, कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि किसी संपत्ति के दस्तावेज वैध हैं तो निगम को भी सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि उसे क्यों और किस आधार पर सड़क की जद में माना गया।
मास्टर प्लान की सड़क अब प्रशासन की निष्पक्षता का मास्टर टेस्ट बन गई है।
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