सम्पादकीय : प्रणव बजाज
विश्वविद्यालय का मंच सिर्फ भाषण देने की जगह नहीं होता। वहां देश का प्रधानमंत्री जब छात्रों के सामने खड़ा होता है तो असल परीक्षा उसकी सरकार की उपलब्धियों की नहीं, उसकी कल्पना की होती है—वह अगली पीढ़ी को किस भारत के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है।
1958 में दिल्ली विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में जवाहरलाल नेहरू का भाषण पढ़िए तो एक अलग बौद्धिक बेचैनी दिखाई देती है। परमाणु विज्ञान से लेकर औद्योगिक क्रांति तक, आइंस्टाइन से लेकर पूंजीवाद और साम्यवाद तक, सामाजिक न्याय से लेकर भारतीय संस्कृति और आधुनिक तकनीकी सभ्यता से पैदा होने वाले संकट तक—नेहरू का सवाल था कि बदलती दुनिया में मनुष्य और भारत का भविष्य कैसा होगा? उपलब्ध मूल-स्रोत भी उनके भाषण में औद्योगिक क्रांति और समाजवाद-साम्यवाद के संबंध पर चर्चा दर्ज करता है।
आज के दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विश्वविद्यालयी संवाद एक दूसरी राजनीतिक शैली दिखाता है। छात्रों से बात करते हुए विकास, सरकार की उपलब्धियां, लक्ष्य और नए भारत की परियोजनाएं सामने आती हैं, लेकिन उसी भाषण में विपक्ष के लिए ‘नाराज़ फूफा’ और ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक विशेषण भी जगह बना लेते हैं। इन टिप्पणियों पर विपक्ष ने भी सवाल उठाए कि युवाओं के मंच को राजनीतिक तंज का मंच क्यों बनाया जा रहा है।
यहां सवाल मोदी की भाषा पसंद करने या न करने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति का विश्वविद्यालय में संवाद सत्ता की उपलब्धियों का प्रचार होना चाहिए या आने वाली पीढ़ी के सामने कठिन सवाल रखने का अवसर?
नेहरू के भाषण की आज आलोचना की जा सकती है। उनकी आर्थिक नीतियों, राज्य-नियंत्रित विकास मॉडल और राजनीतिक फैसलों पर गंभीर बहस हो सकती है। लेकिन उनके भाषणों में एक बात लगातार दिखाई देती है—वे अपने समय की वैचारिक चुनौतियों से टकराने की कोशिश करते थे। नेहरू के दौर की आधुनिकता, वैज्ञानिक सोच, औद्योगीकरण और सामाजिक न्याय की परियोजना को लेकर उनके विचार इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा थे।
मोदी की राजनीति की अपनी उपलब्धियां और अपनी वैचारिक भाषा है। बुनियादी ढांचे, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भरता, एआई और 2047 के विकसित भारत जैसे विषय उनके वर्तमान नैरेटिव के केंद्र में हैं। लेकिन जब उपलब्धियों का वर्णन इतना बड़ा हो जाए कि असफलताओं, बेरोजगारी, असमानता, शिक्षा की गुणवत्ता, संस्थानों की स्वायत्तता और युवाओं के वास्तविक सवाल पीछे छूट जाएं, तब विश्वविद्यालय के मंच से सवाल पूछना जरूरी हो जाता है।
क्योंकि छात्र केवल तालियां बजाने वाली भीड़ नहीं हैं। वे उस भारत के नागरिक हैं जिसे आज की सरकारें कल उनके हाथ में सौंपेंगी।
एक प्रधानमंत्री छात्रों को यह भी बता सकता है कि सरकार ने क्या किया; लेकिन एक दूरदर्शी प्रधानमंत्री यह सवाल भी छोड़ जाता है कि अब क्या करना बाकी है।
यही फर्क भाषण और दृष्टि के बीच है।
और शायद आज की सबसे जरूरी बहस यही है—हमारे विश्वविद्यालयों को उपलब्धियों के उत्सव चाहिए या भविष्य के कठिन सवालों से जूझने वाली राजनीतिक और बौद्धिक बहस?

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