इंदौर। मकान तोड़ने के नोटिस को लेकर दायर याचिका पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने कार्रवाई पर रोक लगाते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया है। मामला इस सवाल से जुड़ा है कि जब डिमोलिशन की वैधानिक कार्रवाई का अधिकार नगर निगम कमिश्नर के स्तर पर है, तो अन्य अधिकारी किस अधिकार के तहत तोड़फोड़ के नोटिस जारी कर रहे हैं?
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यही आपत्ति उठाई गई कि नोटिस जारी करने वाले अधिकारी के पास संबंधित कार्रवाई करने का अधिकार नहीं था। अदालत के हस्तक्षेप के बाद संबंधित मकान पर प्रस्तावित कार्रवाई फिलहाल रोक दी गई है।
मामला केवल एक मकान तक सीमित नहीं माना जा सकता। नगर निगम और विकास प्राधिकरणों में अलग-अलग स्तर के अधिकारी भवन निर्माण, अतिक्रमण या अवैध निर्माण को लेकर नोटिस जारी करते हैं। लेकिन नोटिस जारी करने की शक्ति और वास्तविक डिमोलिशन की वैधानिक शक्ति एक ही बात नहीं है।
हाईकोर्ट के रुख ने स्थानीय निकायों की कार्रवाई पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या अधिकारी नियमों के तहत मिली शक्तियों की सीमा में रहकर कार्रवाई कर रहे हैं या पहले नोटिस और बाद में अधिकार तलाशे जा रहे हैं?
अब प्रशासन के लिए जरूरी है कि वह स्पष्ट करे कि नोटिस किस अधिकारी ने किस वैधानिक प्रावधान के तहत जारी किया और अंतिम कार्रवाई का अधिकार किसके पास है। अदालत का यह हस्तक्षेप उन नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो नगर निगम की कार्रवाई के खिलाफ कानूनी राहत तलाश रहे हैं।

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