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इंदौर। सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाली गृहिणी के घरेलू योगदान को लेकर इंदौर जिला कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने महिला की घरेलू सेवाओं का मूल्यांकन ₹30 हजार मासिक मानते हुए उसके आश्रित परिवार को करीब ₹58 लाख की क्षतिपूर्ति देने का आदेश बीमा कंपनी को दिया है।
फैसले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि अदालत ने घर के काम को केवल पारिवारिक जिम्मेदारी मानकर उसकी आर्थिक कीमत को नजरअंदाज नहीं किया। भोजन बनाना, बच्चों और परिवार की देखभाल, घर का प्रबंधन और रोजमर्रा की जिम्मेदारियां—ये सभी ऐसी सेवाएं हैं, जिनके लिए बाहर से व्यक्ति रखा जाए तो खर्च करना पड़ता है।
यह दृष्टिकोण सुप्रीम कोर्ट के जून 2026 के महत्वपूर्ण फैसले से भी जुड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणी की मृत्यु के मामलों में ‘Loss of Domestic Care’ यानी घरेलू देखभाल के नुकसान को अलग क्षतिपूर्ति मद के रूप में मान्यता दी और उपयुक्त मामलों में इसके लिए ₹30 हजार मासिक का आधार तय किया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि गृहिणी का योगदान सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि घरेलू प्रबंधन, बच्चों की देखभाल और परिवार को सहारा देने से भी जुड़ा है।
इंदौर का यह फैसला इसी बदलती न्यायिक सोच को रेखांकित करता है—**घर में काम करने वाली महिला ‘कमाने वाली’ न हो, फिर भी उसके श्रम की आर्थिक कीमत होती है।**

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